• Home
  • Opinion
  • युद्ध के दौर में विश्व मित्र की भूमिका निभाता भारत

युद्ध के दौर में विश्व मित्र की भूमिका निभाता भारत

वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जब कुछ देश सामरिक प्रतिस्पर्धा और युद्ध की मानसिकता से ग्रस्त दिखाई दे रहे है, तब भारत का दृष्टिकोण एक अलग ही संदेश दे रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव तथा युद्ध जैसे हालात के बीच भारत ने जिस प्रकार मानवीय मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों का पालन करते हुए अपना रुख स्पष्ट किया है, वह भारतीय सभ्यता और संस्कृति की गहराई को दर्शाता है। भारत ने एक बार फिर यह सिद्ध किया है कि वह शक्ति की राजनीति का समर्थक नहीं, अपितु मानवता और शांति का पक्षधर राष्ट्र है। भारतीय परंपरा में “शरणागत न त्यजेत” का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है, जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति या समूह शरण में आए, उसका कभी त्याग नहीं किया जाना चाहिए। इसी आदर्श को व्यवहार में उतारते हुए भारत ने ईरानी युद्धपोत आईरिस लावन और उसके 183 नौसैनिकों को संकट की घड़ी में संरक्षण प्रदान किया है। यह जहाज भारतीय नौसेना के बहुपक्षीय अभ्यास “मिलन-2026” में भाग लेने के लिए भारत आया था। अभ्यास समाप्त होने के बाद इसे वापस लौटना था, लेकिन तकनीकी खराबी के कारण यह जहाज आगे नहीं बढ़ सका। ऐसे कठिन समय में ईरान सरकार ने भारत से सहायता की अपील की, और भारत ने अपनी परंपरा तथा अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों के अनुरूप इस जहाज को कोच्ची में शरण देकर उसकी सहायता की। भारत का यह निर्णय एक कूटनीतिक कदम के अलावा मानवीय दृष्टिकोण का प्रतीक भी है। संकट की घड़ी में किसी भी देश या उसके नागरिकों की सहायता करना भारत की उस सांस्कृतिक सोच का हिस्सा है, जिसमें “वसुधैव कुटुंबकम्” का भाव निहित है। यही कारण है कि भारत को विश्व समुदाय एक जिम्मेदार और संवेदनशील सदस्य मानता है। इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जब भारत ने संकटग्रस्त लोगों को शरण दी- चाहे वे पारसी समुदाय हों, तिब्बती शरणार्थी हों या किसी अन्य देश के संकटग्रस्त नागरिक। यही परंपरा आज भी भारत की विदेश नीति और मानवीय दृष्टिकोण को प्रभावित करती है।

इस संदर्भ में यह घटना और भी मार्मिक हो जाती है क्योंकि इसी नौसैनिक अभ्यास से लौटते समय एक अन्य ईरानी युद्धपोत आईरिस डेना  को अमेरिका ने टॉरपीडो हमले में डुबो दिया था, जिसमें 87 ईरानी नौसैनिकों की मृत्यु हो गई। इस दुखद घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि युद्ध की परिस्थितियों में मानवीय जीवन कितना असुरक्षित हो जाता है। ऐसे माहौल में भारत का कदम शांति और सहअस्तित्व का संदेश देता है। भारत ने स्पष्ट रूप से यह भी जताया है कि वह किसी भी युद्ध में किसी पक्ष का समर्थक नहीं है। उसकी विदेश नीति का मूल उद्देश्य शांति, स्थिरता और सहयोग को बढ़ावा देना है। भारत यह मानता है कि युद्ध किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। संवाद, कूटनीति और पारस्परिक सम्मान ही अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने का सबसे उचित मार्ग हैं। ईरानी जहाज को शरण देना इस बात का प्रमाण है कि भारत अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करता। उसने अंतरराष्ट्रीय युद्ध नियमों का सम्मान किया व अपनी सांस्कृतिक विरासत का भी पालन किया। भारतीय दर्शन सदैव मानवता, करुणा और सहानुभूति की भावना को सर्वोपरि मानता है, और भारत का यह कदम उसी परंपरा का आधुनिक रूप है। किसी भी संकट के समय जो देश या व्यक्ति सहायता के लिए आगे आता है, वही सच्चा मित्र कहलाता है। भारत ने ईरान की सहायता करके यह दिखा दिया है कि वह क्षेत्रीय शक्ति नहीं, विश्व समुदाय का एक जिम्मेदार और भरोसेमंद विश्व मित्र है। इस प्रकार भारत ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि उसकी शक्ति का वास्तविक आधार मानवता, शांति और सहयोग की भावना में निहित है। आज जब विश्व अनेक संघर्षों और तनावों से जूझ रहा है, तब भारत का यह दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है। भारत का संदेश स्पष्ट है- शक्ति का प्रयोग विनाश के लिए नहीं, अपितु मानवता की रक्षा के लिए होना चाहिए। यही भारतीय सभ्यता की आत्मा है और यही वह आधार है, जिस पर भारत अपनी वैश्विक भूमिका का निर्माण कर रहा है। आने वाले समय में यदि विश्व समुदाय इस दृष्टिकोण को अपनाने की दिशा में आगे बढ़े, तो संभव है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध अधिक संतुलित, मानवीय और स्थिर बन सकें।

  • हरिओम कोचर, सीनियर रिसर्च फेलो, सेंटर फॉर कश्मीर स्टडीज, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ़ हिमाचल प्रदेश, धर्मशाला

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top