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बदलते मौसम की चुनौती और हमारी जिम्मेदारी

मानव सभ्यता का इतिहास प्रकृति के साथ गहरे सम्बन्धों से जुड़ा रहा है। ऋतुओं का क्रम, वर्षा का समय और तापमान का उतार‑चढ़ाव जीवन की धुरी रहे हैं। किन्तु आज यह धुरी असन्तुलित होती जा रही है। मौसम का स्वरूप जिस तीव्रता से बदल रहा है, उसने आम जनजीवन को असुरक्षित जैसा बना दिया है। औद्योगिकीकरण और प्रदूषण ने वातावरण को असामान्य बना दिया है। वनों की कटाई और अनियन्त्रित शहरीकरण ने प्राकृतिक सन्तुलन को बिगाड़ दिया है। इसका असर सबसे पहले कृषि पर दिखाई देता है। असमय वर्षा और लम्बे सूखे ने किसानों की फसलें चौपट कर दी हैं। स्वास्थ्य पर भी इसका गहरा असर है—हीट स्ट्रोक, मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियाँ बढ़ रही हैं।

वैश्विक स्तर पर भी स्थिति चिन्ताजनक है। अन्तर्राष्ट्रीय रिपोर्टें बताती हैं कि पिछले पचास वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान लगभग 1.2 डिग्री सेल्सियस बढ़ चुका है। हिमनदों का पिघलना समुद्र स्तर को बढ़ा रहा है, जिससे तटीय क्षेत्रों में बाढ़ का खतरा है। दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में सूखा और जल संकट गहराता जा रहा है। इसी संकट से निपटने के लिए विश्व समुदाय ने पेरिस समझौता किया था। फ्रांस की राजधानी पेरिस में 2015 में सम्पन्न इस ऐतिहासिक सन्धि का उद्देश्य वैश्विक तापमान वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखना और सम्भव हो तो 1.5 डिग्री तक सीमित करना है। इसके तहत सभी देशों को अपनी राष्ट्रीय रूप से निर्धारित योगदान योजनाएँ प्रस्तुत करनी होती हैं और हर पाँच वर्ष में उन्हें और अधिक महत्वाकांक्षी बनाना अनिवार्य है। यह समझौता इस बात का प्रतीक है कि जलवायु परिवर्तन से लड़ना केवल कुछ देशों की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरी मानवता का साझा दायित्व है। अभी पृथ्वी का औसत तापमान औद्योगिक क्रान्ति से पहले के स्तर की तुलना में लगभग 1.2 से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक है। 2024 अब तक का सबसे गर्म वर्ष दर्ज हुआ था और 2025 में तापमान औसतन 1.19 डिग्री सेल्सियस अधिक रहा। 2026 की शुरुआत भी रिकॉर्ड गर्म रही है और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह वर्ष इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में से एक होगा।

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में मौसम परिवर्तन का असर और भी गहरा है। उत्तर भारत में असमय वर्षा और ओलावृष्टि से गेहूँ की फसल प्रभावित हुई है, दक्षिण भारत में मानसून की अनिश्चितता ने धान उत्पादन को संकट में डाल दिया है। कानपुर, बुन्देलखण्ड और विदर्भ जैसे क्षेत्रों में सूखे की समस्या किसानों को आत्महत्या तक के लिए विवश कर रही है। यह संकट अचानक नहीं आया। औद्योगिक क्रान्ति के बाद से ही कार्बन उत्सर्जन बढ़ता चला गया। बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी कि यदि उत्सर्जन पर नियन्त्रण नहीं किया गया तो पृथ्वी का तापमान असामान्य रूप से बढ़ेगा। दुर्भाग्य से इन चेतावनियों को समय रहते गम्भीरता से नहीं लिया गया। आज हम उसी लापरवाही का परिणाम भुगत रहे हैं।

विज्ञान बताता है कि वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा औद्योगिक क्रान्ति से पहले लगभग 280 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) थी, जो आज 420 पीपीएम से अधिक हो चुकी है। यह वृद्धि सीधे तौर पर पृथ्वी के तापमान को बढ़ा रही है। समुद्री धाराओं में असन्तुलन, एल‑नीनो और ला‑नीना जैसी घटनाएँ अब अधिक बार और अधिक तीव्रता से घटित हो रही हैं। एल‑नीनो अर्थात जब प्रशान्त महासागर की सतह का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है और व्यापारिक हवाएँ (भूमध्यरेखीय क्षेत्र की स्थिर पूर्वी हवाएँ) कमजोर पड़ जाती हैं। इसके कारण दक्षिण अमेरिका में बाढ़ और वर्षा बढ़ जाती है जबकि एशिया और ऑस्ट्रेलिया में सूखा पड़ सकता है। इसके विपरीत ला‑नीना वह स्थिति है जब हवाएँ सामान्य से अधिक तेज़ हो जाती हैं और गर्म पानी एशिया की ओर धकेल दिया जाता है, जिससे दक्षिण अमेरिका के तट पर समुद्र का पानी असामान्य रूप से ठण्डा हो जाता है। इस दौरान एशिया और ऑस्ट्रेलिया में अधिक वर्षा होती है जबकि अमेरिका के दक्षिणी हिस्सों में सूखा और ठण्डा मौसम देखा जाता है। यह चक्र हर कुछ वर्षों में दोहराता है। भारत के मानसून पर भी इसका गहरा असर पड़ता है। एल‑नीनो के दौरान मानसून कमजोर पड़ सकता है, जिससे फसलें प्रभावित होती हैं, जबकि ला‑नीना के दौरान वर्षा सामान्य से अधिक हो सकती है।

मौसम परिवर्तन केवल वैज्ञानिक आँकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति और परम्पराओं को भी प्रभावित कर रहा है। भारत में होली, दीपावली और मकर संक्रान्ति जैसे पर्व ऋतु चक्र से जुड़े हैं। किन्तु अब मौसम की अनिश्चितता ने इन त्योहारों की पारम्परिक छवि को बदल दिया है। कभी मार्च में ठण्डी हवाएँ चलती थीं, अब उसी समय भीषण गर्मी का अनुभव होता है। किसान जो पहले पञ्चांग देखकर खेती करते थे, अब उन्हें आधुनिक मौसम पूर्वानुमान पर निर्भर होना पड़ रहा है। ग्रामीण जीवन की लय टूट रही है और शहरी जीवन में भीषण गर्मी और प्रदूषण ने स्वास्थ्य संकट खड़ा कर दिया है।

सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है विकास और पर्यावरण के बीच सन्तुलन बनाने की है। उद्योगों को बढ़ावा देना आवश्यक है, किन्तु यदि यह प्रकृति की कीमत पर होगा तो विकास टिकाऊ नहीं रह पाएगा। भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश बढ़ाया है, किन्तु अभी भी कोयला आधारित बिजली उत्पादन पर भारी निर्भरता है। नीति‑निर्माताओं को चाहिए कि वे स्वच्छ ऊर्जा को प्राथमिकता दें, सार्वजनिक परिवहन को सुदृढ़ करें और हरित प्रौद्योगिकी को बढ़ावा दें। जनसहभागिता भी उतनी ही आवश्यक है। यदि नागरिक स्वयं ऊर्जा की बचत करें, वृक्षारोपण में भाग लें और प्लास्टिक का प्रयोग कम करें तो बड़ा बदलाव सम्भव है। शिक्षा संस्थानों में पर्यावरण अध्ययन को केवल औपचारिक विषय न मानकर व्यवहारिक प्रशिक्षण का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

भविष्य की चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। यदि तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री तक सीमित नहीं किया गया तो आने वाले दशकों में समुद्र स्तर इतना बढ़ सकता है कि कई तटीय शहर जलमग्न हो जाएँगे। हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना नदियों के प्रवाह को अस्थिर कर देगा। इससे न केवल कृषि प्रभावित होगी बल्कि जल विद्युत परियोजनाएँ भी संकट में पड़ जाएँगी। जल संकट और पलायन जैसी समस्याएँ सामाजिक असमानता को और गहरा कर देंगी। सम्पन्न वर्ग के पास संसाधन हैं, वे आपदा से उबर सकते हैं, किन्तु गरीब और किसान वर्ग के लिए यह संकट जीवन‑मरण का प्रश्न बन जायेगा।

निष्कर्षतः बदलते मौसम का संकट केवल वैज्ञानिक या सरकारी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह हर नागरिक की जिम्मेदारी है। यदि हम अभी कदम नहीं उठाते तो आने वाली पीढ़ियाँ एक असुरक्षित और असन्तुलित पृथ्वी पर जीवन जीने को विवश होंगी। मानवता के अस्तित्व की रक्षा के लिए आवश्यक है कि हम प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करें। यह केवल पर्यावरणीय आन्दोलन नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा का अभियान है।  – डॉ.दीपकुमार शुक्ल (स्वतन्त्र टिप्पणीकार)

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