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नियम विरुद्ध अनुचर की गाड़ी से निरीक्षण: दोहरे लाभ और अनियमितता पर सवाल

बछरावां, रायबरेली। अपर मुख्य सचिव, महानिदेशक स्कूली शिक्षा एवं शिक्षा निदेशक (बेसिक) के स्पष्ट निर्देशों की खुली अनदेखी करते हुए कंपोजिट विद्यालय–चुरूवा में तैनात अनुचर अरुण कुमार शर्मा का बछरावां के बीईओ द्वारा लगातार दुरुपयोग किए जाने के गंभीर आरोप सामने आए हैं। नियमों को दरकिनार कर उसे निजी चालक बना दिया गया है, जबकि उसका मूल दायित्व विद्यालय की साफ-सफाई है। इसके विपरीत वह वर्षों से बीईओ के साथ निरीक्षण कार्यों में सक्रिय भूमिका निभा रहा है।
शिकायतों के बावजूद संरक्षण प्राप्त होने के कारण उक्त अनुचर खुलेआम दोहरा लाभ ले रहा है—एक ओर सरकारी वेतन, दूसरी ओर निजी वाहन एवं चालक के रूप में अतिरिक्त आर्थिक लाभ। विभागीय वाहन उपलब्ध होने के बावजूद उसकी निजी गाड़ी संख्या UP33-BN-6005 पर अवैध रूप से “उत्तर प्रदेश सरकार” अंकित कर उपयोग किया जाना नियमों का स्पष्ट उल्लंघन और दंडनीय कृत्य है।
सूत्रों के अनुसार उक्त अनुचर लगभग चार वर्षों से बीआरसी में अनधिकृत रूप से चालक के रूप में कार्यरत है, जबकि उसका अटैचमेंट पहले ही निरस्त हो चुका है। इसके बावजूद मौखिक आदेशों के आधार पर उससे सेवाएं लेना और अभिलेखों में उपस्थिति दर्ज करना गंभीर रिकॉर्ड हेराफेरी की ओर संकेत करता है। स्थिति इतनी असामान्य हो चुकी है कि हर निरीक्षण में उसकी भूमिका बीईओ के साथ दिखाई देती है, और यह भी चर्चा में है कि निरीक्षण का शेड्यूल भी उसी द्वारा तय किया जाता है। इतना ही नहीं, शिक्षकों को जारी होने वाली नोटिसों के निस्तारण और उनसे संबंधित प्रक्रियाओं में भी उसी अनुचर की सक्रिय भूमिका सामने आ रही है, जिससे विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। “सेटिंग-गेटिंग” और हितसाधक तंत्र के चलते एक अनुचर का प्रभाव इतना बढ़ जाना कि वह “मिनी बीईओ” की भूमिका में दिखाई देने लगे, प्रशासनिक ढांचे की कमजोरी को उजागर करता है। सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जब विभाग द्वारा सरकारी बुलेरो वाहन पहले से आवंटित है, तो निजी वाहन का उपयोग क्यों किया जा रहा है। इससे यह संदेह और गहरा होता है कि कहीं विभागीय वाहन मद का भुगतान भी अनुचर को कराकर उसे अवैध दोहरा लाभ तो नहीं पहुंचाया जा रहा। शिक्षकों द्वारा कई प्रार्थना पत्र दिए जाने के बावजूद जांच न होना इस बात का संकेत है कि पूरे प्रकरण को भीतर से संरक्षण प्राप्त है। यह मामला केवल अनियमितता नहीं, बल्कि संगठित भ्रष्टाचार, पद के दुरुपयोग और प्रशासनिक तंत्र की निष्क्रियता का गंभीर उदाहरण है। मुख्यमंत्री की “जीरो टॉलरेंस” नीति को खुली चुनौती देते इस प्रकरण में यदि तत्काल कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो यह पूरे शिक्षा तंत्र में गलत संदेश देगा। अतः आवश्यक है कि निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों एवं हितसाधक तत्वों के विरुद्ध कड़ी दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

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