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के सी वेणुगोपाल पर भारी पड़े सतीशन

» वी डी सतीशन होंगे केरल के मुख्यमंत्री

राजीव रंजन नाग: नई दिल्ली। 10 दिनों की गहन चर्चाओं और बैठकों के बाद एक बेहद रोमांचक और कड़े मुकाबले के बाद कांग्रेस आलाकमान ने आखिरकार एक मुश्किल फैसला लेते हुए केरल के मुख्यमंत्री की कुर्सी वी. डी. सतीशन को सौंप दी है। पिछली विधानसभा (2001) में सतीशन विपक्ष के नेता थे। सतीशन ने कांग्रेस को सत्ता तक पहुंचाने में खासे मेहनत की है, लिहाजा वह पार्टी की पहली पसंद थे।

गुरुवार सुबह आखिरकार सस्पेंस खत्म हो गया, जब कांग्रेस ने अन्य शीर्ष दावेदारों केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला के बजाय सतीशन को कांग्रेस विधायक दल (CLP) का नेता और केरल के मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी पसंद घोषित किया। घोषणा के बाद अपने पहले बयान में 61 वर्षीय वी. डी. सतीशन ने कहा कि वह वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और शीर्ष पद के दावेदारों के सी वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला को विश्वास में लेंगे।

सतीशन ने कहा, “मैं इस पद को अपनी निजी उपलब्धि के तौर पर नहीं, बल्कि एक दैवीय चीज़ के तौर पर देखता हूँ। यह वेणुगोपाल ही थे जिन्होंने एआईसीसी की सभी गतिविधियों का समन्वय किया। उनका समर्थन बहुत ज़्यादा था। रमेश चेन्निथला भी मेरे नेता हैं। मैं उन सभी को पूरी तरह से विश्वास में लूँगा…”

जहाँ एक तरफ पूरे राज्य में उनकी जीत का जोरदार जश्न मनाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ सतीशन की असली चुनौतियाँ तो अब शुरू हुई हैं। उन्हें सिर्फ जनता का जनादेश ही नहीं मिला है, बल्कि उन्हें राजनीतिक, सांप्रदायिक और संस्थागत चुनौतियों का एक ऐसा जाल भी विरासत में मिला है, जो उनके कार्यकाल को या तो नई ऊँचाइयों पर ले जा सकता है या फिर उसे पूरी तरह से पटरी से उतार सकता है।

केरल के अगले मुख्यमंत्री पर फैसला 4 मई से ही लंबित था, जब कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF ने 140 में से 102 सीटें जीती थीं, जो दो-तिहाई बहुमत से भी ज्यादा है। 140 सदस्यों वाली केरल विधानसभा में कांग्रेस के 63 विधायक हैं। उसके सहयोगी दलों में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के पास 22, केरल कांग्रेस (KEC) के पास आठ और रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (RSP) के पास तीन सीटें हैं।

कांग्रेस के शीर्ष सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस के 63 विधायकों में से 40 ने के. सी. वेणुगोपाल को शीर्ष पद के लिए अपना समर्थन दिया था। टिकट वितरण में वेणुगोपाल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन कांग्रेस हाई कमान ने राज्य के शीर्ष पद के लिए उनकी दावेदारी को नजरअंदाज कर दिया है। वेणुगोपाल संसद में महत्वपूर्ण समझे जाने वाले लोक लेखा समिति के अध्यक्ष हैं। मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद उन्हें लोकसभा से न केवल इस्तीफा देना पड़ता, बल्कि उनके लिए विधानसभा में भी एक सीट की व्यवस्था करनी पड़ती। केरल के एक सांसद ने कहा- पार्टी नेतृत्व का करीबी होना अलग बात है। दरअसल, राज्य में लोगों के बीच सतीशन के मुकाबले वेणुगोपाल की स्वीकार्यता सीमित है।

सतीशन ने पार्टी को सत्ता तक पहुंचाने में जमीनी स्तर पर बहुत काम किया। सतीशन को एक ऐसी विधायक दल की कमान मिली है, जो ऐसे लोगों से भरा है जिन्होंने सतीशन के पक्ष में आवाज नहीं उठाई थी। वेणुगोपाल और रमेश चेन्निथला के नेतृत्व वाले ताकतवर गुट ज्यादा समय तक चुप रहने वाले नहीं हैं।

राज्य के लोगों और पार्टी कार्यकर्ताओं के पास वी. डी. सतीशन के मुख्यमंत्री बनने पर खुश होने की वजह है, क्योंकि इस पद के लिए वे ही उनकी पहली पसंद थे। राहुल गांधी के करीबी सहयोगी होने के नाते के. सी. वेणुगोपाल इस दौड़ में सबसे आगे थे, लेकिन उनकी नहीं चली।

CLP का एक-सूत्री प्रस्ताव, जिसमें नेता का नाम तय करने का अंतिम अधिकार हाई कमान को दिया गया था, खड़गे और राहुल के पास मौजूद था। लेकिन लोगों से जुड़ाव का जो फायदा भावी मुख्यमंत्री को हासिल था—उसे वेणुगोपाल के हाई कमान से जुड़ाव के मुकाबले ज्यादा अहमियत दी गई। केरल में सीएम चयन के सुखद अंत के साथ कांग्रेस अब दक्षिण के तीन राज्यों—कर्नाटक, तेलंगाना और केरल—में सत्ता में है। इसके अलावा तमिलनाडु में अभिनेता जोसेफ की सरकार में वह सत्ताधारी गठबंधन का भी हिस्सा है।

भारत अभी भी सिर्फ दो-दलीय राजनीति वाला देश नहीं बना है। क्योंकि उत्तर प्रदेश (समाजवादी पार्टी), बिहार (JD-U और RJD), महाराष्ट्र (शिवसेना और NCP), आंध्र प्रदेश (TDP और YSRCP), तेलंगाना (BRS), तमिलनाडु (DMK) और पश्चिम बंगाल (80 सीटों वाली तृणमूल कांग्रेस) जैसे राज्यों में आज भी बड़ी क्षेत्रीय ताकतें मजबूत हैं।

आर्थिक संकट, अंदरूनी गुटबाजी और सांप्रदायिक संतुलन बनाने की चुनौतियों के बीच, सतीशन के सामने कमजोर पड़ चुके वामपंथ और फिर से मजबूत हो रही भाजपा का सामना करने की चुनौतियां होंगी। सतीशन के राजनीतिक उभार पर हमेशा से ही उनके और ‘जमात-ए-इस्लामी’ के बीच समझौते के आरोपों की छाया मंडराती रही है। ‘जमात-ए-इस्लामी’ ने सतीशन के पक्ष में मुस्लिम वोटों को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई है। इसके अलावा सतीशन के सामने एक और बेहद मुश्किल और नाजुक काम है—उन्हें एक तरफ ‘जमात’ और दूसरी तरफ उसके कट्टर विरोधी संगठन ‘समस्ता’ (सुन्नी समुदाय की सर्वोच्च संस्था) के बीच संतुलन बनाने की चुनौती होगी। ये संगठन राज्य की राजनीति में खासा दखल रखते हैं। ‘समस्ता’ ने भी सतीशन को अपना परोक्ष समर्थन दिया था।

UDF गठबंधन में शामिल सभी सहयोगी दल सतीशन को मुख्यमंत्री बनाने के फैसले पर पूरी तरह से एकमत थे। लेकिन इन सभी दलों में से ‘मुस्लिम लीग’ का समर्थन सबसे ज्यादा मुखर और जोरदार था। IUML ने कांग्रेस को उन सीटों पर भी निर्णायक जीत दिलाने में अहम भूमिका निभाई, जहाँ कांग्रेस का अपना संगठनात्मक ढांचा या पकड़ उतनी मजबूत नहीं थी। कांग्रेस हाई कमान ने अपने सहयोगी मुस्लिम लीग, जिसने खुलकर सतीशन का समर्थन किया, का ध्यान रखा है।

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