हमारे देश में सबसे ज्यादा लोकप्रिय क्या बात है? आपको पता है? फूफा जी की नाराजगी, महिलाओं का एक-दूसरे से जलना और उस पर टिप्पणियां करना…. अरे नहीं जनाब, इन बातों से भी ज्यादा लोकप्रिय बात है हमारे यहां राजनीति पर चर्चा। जो लोग एप्पल माने सेब और हाथी माने हाथी बोलते हैं, उनका भी प्रिय विषय राजनीति पर चर्चा ही है। अगर हम कहीं घूमने भी जा रहे हों तो गाड़ी का ड्राइवर भी हमसे इसी विषय पर ही चर्चा करता है। चाट-चटपटे, बताशे खाने गए तो वहां पर भी एक-दो बातें राजनीति पर सुनने को मिल ही जाती हैं।
वैसे तो राजनीति का इतिहास बहुत पुराना है, सतयुग से चला आ रहा है। अब देखिए न, मंथरा हमारी गुरु मां है! राजनीति की शुरुआत तो उन्होंने ही की। वो कैकेयी के कान न भरतीं तो (मतलब राजनीति न करतीं) भरत को राजकाज कैसे मिलता? शूर्पणखा अपने भाई को अपना दुख न सुनाती, माने राजनीति न करती, तो युद्ध कैसे होता? वैसे भी इस प्रोफेशन में सही-गलत कौन देखता है… है न!
सही मायने में राजनीति के गुरु तो चाणक्य माने जाते हैं, लेकिन सतयुग में राजनीति की शुरुआत तो मंथरा ने ही की थी, बस! हमरा तो यही मानना है! कितना पॉपुलर विषय है ये राजनीति! वैसे 2014 के पहले हम तो राजनीति का “र” भी नहीं जानते थे। अब तो हर आया-गया राजनीति पर ज्ञान दे जाता है हमें!
आदमी टीवी पर डिबेट बिल्कुल टीवी सीरियल की तरह देखता है। जूझ रहे हैं लोग टीवी शो में और असर देखने वाले पर! डायनिंग टेबल पर भी रोचक विषय यही रहता है। आजकल फिल्म स्टार इतना महत्व नहीं रखते, जितना ये विषय। आप सच में यकीन नहीं करेंगे कि टैक्सी ड्राइवर, कामवाली बाई, दूधवाला, किराने वाला—इनको अपने धंधे से ज्यादा इस विषय पर बात करना पसंद है और तो और, वो पानीपुरी वाला भी विश्लेषण करता है भाईसाब। अब पानीपुरी खाएं या राजनीति पर चर्चा करें, समझ में नहीं आता!
वैसे राजनीति में आज भी महिलाएं पीछे नहीं हैं। अब देखिए, हमारी संसद तो घर तक ही सीमित है, तो हम घर में ही राजनीति कर लेते हैं। पति महोदय स्पीकर का रोल निभाते हुए बस “शांत रहिए… शांत रहिए…” करते रहते हैं। लेकिन हमारी नेताइन लोग बड़ा जोर-जोर से राजनीति करती हैं। मगर पता नहीं क्यों, इस बार सिलेंडर रानी चुप हैं? महिला अपराध पर अधोवस्त्र क्वीन भी महिला अपराधों पर मौन धारण किए हुए हैं, जबकि वह खुद को विपक्ष द्वारा असहज महसूस करती हैं?
अब देखिए न, राजनीति में आप शिक्षा जैसे मसले पर बात ही नहीं कर सकते, क्योंकि वो जरूरी नहीं है। तभी तो स्कूल बंद करवा दिए गए! और उसमें जनता का इंटरेस्ट भी तो नहीं रहता है न! जनता भी तो चटखारे लेकर खबरें हिंदू-मुस्लिम की ही सुनती है, मंदिर-मस्जिद की ही सुनती है। तो बस राम को लाया जा रहा है और राम के राज को भगाया जा रहा है।
अब देखिए, मैं तो खुश हो जाती हूं सिर्फ महिलाओं की भागीदारी देखकर! अरे, मीडिया में भी तो महिला चिल्ला-चिल्लाकर ही तो न्यूज़ बोलती है (पढ़ती नहीं है), डिबेट करवाती है। कब्बो-कब्बो डर लागत है कि कहीं टीवी में से बाहर न आ जाए?
राजनीति का एक दौर हुआ करता था, जहां संसद में अपने विचार रखे जाते थे, भाषाई मर्यादा होती थी, पद और प्रतिष्ठित लोगों के साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार होता था। खैर, अब अमृतकाल है तो गालियां और गलीज़ शब्दों का उच्चारण तो आम बात है। ट्रोल हो गए तो क्या हुआ, बाद में माफी भी मांग लेंगे या लीपापोती कर देंगे। मगर हमारी राजनीति ऐसे ही चलती रहेगी। और हां, आजकल मेलोडी चॉकलेट काफी ट्रेंड में है! आप लोग भी अपने नेता, विधायक, पार्टी भैया लोगों को मेलोडी गिफ्ट किया करें। बाकी तो आप मेलोडी खाओ और खुद जान जाओ!
परीक्षाओं का रद्द होना, पेपर का लीक होना, सिलेंडर की शॉर्टेज होना, तेल की कमी, पेट्रोल की कमी, अपराधों में लिप्त नेता और बाबा—ये सारे मसले आप मेलोडी चॉकलेट खाते हुए सोच सकते हैं। नहीं तो भूरे काका को गरिया कर अपनी भड़ास भी निकाल सकते हैं!
- प्रियंका वर्मा माहेश्वरी, गुजरात





