सब कुछ ज़िंदा है जग में,
इच्छा शक्ति है ज़िंदा।
विश्व ढला जो संस्कारों में,
प्रगति रुके न रुका।
घूमेंगे निर्द्वंद्व होके,
हिरण, शेर व चीता।
काल कोठरी जीवन में,
चक्र लगाता रहता।
मन के उच्छ्वासों में,
चक्कर काटा करता।
कल-कल, छल-छल झरने,
बिना रुके बहते जाना।
जीवन को संबोधित करते,
प्रकृति और पत्ता-पत्ता।
कानों में मिश्री-सा घोले,
हर प्राणी के मन को छूता।
जो आडंबर से दूर रहें,
वह जीवन में परिपूर्ण रहा।
सब संभव हो जाए जगत में,
सोच-समझ साकार जो होता।
इन आड़े-टेढ़े धागों से,
एक नया पोशाक है बनता।
जो उलझे थे खुद से सुलझे,
यहां कौन किसे है सुलझाता।
विश्वास में सब ऐसे डूबे,
जैसे शीरा में हो चींटा।
मोह में भ्रमर फंसा कमल में,
उसका क्षण-क्षण कैसे बीता।
जिसका दर्द बस वही जाने,
जिसके पैर बेवाई फाटा।
यदि तुम मानवता में जीते,
गर्व से तुझ पर “नाज़” मैं करता।
✍️ डॉ. साधना शर्मा
(राज्य अध्यापक पुरस्कार प्राप्त)
प्र. प्र. अ., पूर्व माध्यमिक विद्यालय कन्या सलोन, रायबरेली



