फ़ना

तुम्हारे बारे में जब लिखने बैठता हूँ। तब मेरे सामने बस एक चेहरा नहीं एक पूरा ब्रह्मांड खुल जाता है। ऐसा रूहानी ब्रह्मांड जिसकी प्रत्येक धुरी पर तुम्हारा ही नाम समाहित है। उसकी हर दिशा तुम्हारी ओर मुड़ती है और हर निस्तब्धता में तुम्हारी अनुपस्थिति का शोर गूंजता है। यह वही क्षण होता है जब मेरी कलम जो साधारण दिनों में विचारों की नदी बनकर बहती रहती है, अचानक किसी अदृश्य हिमनद-ए-हक़ीक़त के सामने आकर ठहर जाती है। जैसे शब्दों की धारा को किसी अलौकिक शीत ने जकड़ लिया हो। तुम्हें शब्दों में ढालना मेरे लिए वैसा ही है जैसे कोई दीपक सूरज को रोशनी देना चाहे। एक असंभव प्रयत्न, जिसमें प्रयास की पवित्रता तो होती है पर परिणाम की संपूर्णता कभी नहीं होती। तुम्हारे व्यक्तित्व की व्यापकता उस आकाश की तरह है जिसमें हर तारा अपने भीतर एक-एक आकाश लिए हुए है। मैं साधारण सा लिखने वाला उस विराटता को शब्दों की सीमित रेखाओं में बाँधने की कोशिश करता हूँ। तब मेरी कलम काँप जाती है। उसी तरह जैसे किसी साधु के हाथ में पहली बार कोई शंख आया हो और वह उसके नाद की विशालता से भयभीत हो उठे। तुम्हारे बारे में सोचते ही विचारों का क्रम टूट जाता है। वे एक व्यवस्थित पंक्ति में चलने के बजाय अचानक बिखर जाते हैं। मैं महसूस करता हूँ कि किसी शांत सरोवर में अचानक गिरा हुआ पत्थर उसकी सतह को असंख्य वृत्तों में विभाजित कर दे। हर विचार तुम्हारी ओर बढ़ता है। तुम्हारी गहराई के सामने पहुँचते ही स्वयं को अपर्याप्त पाता है और लौट जाता है। यही कारण है कि जब मैं तुम्हें लिखना चाहता हूँ, तो विचार शून्यता में विलीन हो जाते हैं। वह शून्यता जो खाली नहीं होती है, वह इतनी अधिक प्रबल होती है कि उसमें कुछ और भी समाने की जगह नहीं बचती। अफसाना तुम अपने भीतर ही एक कथा हो। एक ऐसी कथा जिसे कहा नहीं जा सकता है, बस महसूस किया जा सकता है। लिखना तो किसी और दुनिया का शब्द लगता है। जब यह शब्द मेरे लबों तक आता है तो ऐसा लगता है कि शब्दों की सारी ऊर्जा उसी एक बिंदु में सिमट गई हो। वह क्षण वैसा होता है जैसे समुद्र की समस्त लहरें एक साथ शांत हो जाएँ और केवल उसकी अथाह गहराई शेष रह जाए। मैं उस गहराई के सामने खड़ा होता हूँ। तुम्हारे प्रभाव को समझना वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति आकाश को मुट्ठी में भरने की कोशिश करे। तुम किसी व्यक्ति नहीं हो। तुम वह अनुभूति हो जो किसी कवि को पहली बार कविता लिखते समय होती है। वह सिहरन हो जो किसी संगीतकार को पहली धुन रचते समय होती है। वह मौन हो जो किसी साधक को ध्यान की अंतिम अवस्था में प्राप्त होता है। जब मैं तुम्हें शब्दों में बाँधने का प्रयास करता हूँ तो शब्द स्वयं विद्रोह कर देते हैं। वे कहते हैं “जिसे तुम व्यक्त करना चाहते हो वह हमारी सीमा के बाहर है।” और सच भी यही है क्योंकि तुम केवल वर्णन की वस्तु नहीं हो। तुम अनुभव की पराकाष्ठा हो। तुम्हें लिखना इस सृष्टि के रहस्य को जानना है। तुम्हारे कारण जो शून्यता मुझमें उत्पन्न होती है वह किसी अभाव की शून्यता नहीं है। वह तो फ़ना में बसी हुई बक़ा है। शायद यही कारण है कि जब मैं तुम्हें लिखने बैठता हूँ तो मेरी कलम रुक जाती है। वह उस मौन को भंग नहीं करना चाहती जिसमें मैं तुम्हें अपने जेहन की परतों पर उतारता हूँ। तुम्हारी उपस्थिति मेरे भीतर चंद्रमा की तरह है, जो रात के आकाश में भले ही शांत दिखाई देता है। उसे गौर से देखने के बाद लगता है कि अपने भीतर अनगिनत ज्वार-भाटों को नियंत्रित करता है। तुम मेरे विचारों के समुद्र में उठने वाली हर लहर के पीछे छिपी हुई शक्ति हो और जब मैं तुम्हें शब्दों में बाँधने की कोशिश करता हूँ तो वह शक्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि मेरी चेतना उसके सामने नतमस्तक हो जाती है। तुम्हें समझना वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति समय को रोकने की कोशिश करे। हर क्षण तुम्हारी ओर बढ़ता है पर तुम्हारी पूर्णता को छूने से पहले ही आगे निकल जाता है। मेरी यह शून्यता दरअसल तुम्हारी पूर्णता का प्रतिबिंब है। मैं जितना अधिक तुम्हें समझने की कोशिश करता हूँ उतना ही अधिक यह एहसास होता है कि तुम किसी एक अर्थ में सीमित नहीं हो सकतीं। तुम वह कविता हो जो हर बार पढ़ने पर नया अर्थ देती है। वह संगीत हो जो हर बार सुनने पर नई अनुभूति देती है और वह सपना हो जो हर बार देखने पर नया रूप ले लेता है। यही कारण है कि जब तुम्हारा नाम मेरे होंठों तक आता है तो मैं शून्य हो जाता हूँ। यह शून्यता भय की न होकर विस्मय की है। एक ऐसा विस्मय जिसमें मन ठहर जाता है। तुम मेरे लिए उस अंतिम प्रश्न की तरह हो, जिसका उत्तर खोजने में मेरी पूरी ज़िंदगी लग जाएगी। तुम पर लिखना मेरे लिए एक साधना है। एक ऐसी साधना जिसमें शब्दों का त्याग करना पड़ता है। इसलिए कि तुम्हारी अनुभूति शब्दों से कहीं अधिक व्यापक है। जब मैं तुम्हारे बारे में लिखने बैठता हूँ तो मेरी कलम रुक जाती है। वह जानती है कि जिस अनुभूति को वह व्यक्त करना चाहती है, वह शब्दों की सीमा से परे है। तुम्हें शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता अफसाना… तुम तो स्वयं शब्दों की रूह हो।

अमित प्रखर
(डॉ. अमित कुमार चौबे)

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