ग़ज़ल

बहुत सच्चा, ज़रा झूठा नहीं है
कभी यूँ बे-सुकूं रहता नहीं है

भला तारीफ़ उसकी क्यूँ करें सब
कहीं कुछ भी अगर अच्छा नहीं है

सभी पर आज मँहगाई मुसल्लत
जहां में कुछ कुछ भी सस्ता नहीं है

सुगम करता रहा जो रास्ते सबके
उसी के वास्ते रस्ता नहीं है

उसे दुनिया कहाँ पहचान पाती
बढ़ाई ख़ुद अगर करता नहीं है

तमामी काम करता है सभी के
ज़बां से पर कभी कहता नहीं है

बहुत जिसके लिए सपने सजाते
हक़ीक़त में वही होता नहीं है

— हमीद कानपुरी (अब्दुल हमीद इदरीसी, मीरपुर, कैण्ट, कानपुर)

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