“अपना ध्यान रखा कर बेटा, समय पर खाना खा लिया कर। तेरे बारे में सोचती रहती हूँ, रात को नींद भी नहीं आती,” माँ ने फोन पर बात करते हुए छोटे भाई से कहा।
“बहू कैसी है रे —— कौन सा महीना — तीसरा, अच्छे से खाना खाने और फल खाने के लिए कहना। अच्छा रखती हूँ,” इतना कहकर माँ ने फोन रख दिया।
माँ छोटे भाई से बात कर रही थी, जिसने दिल्ली में अपना छोटा सा कारोबार जमा लिया था। छोटा भाई पवन और पिता के बीच मतभेद हो गए थे, जिसकी वजह से वह घर छोड़कर चला गया था। लगभग एक साल तक उसका कोई भी पता नहीं चला। फिर पड़ोस के ही एक मित्र, जिससे दिल्ली में उसकी मुलाकात हो गई थी, उसने पता-ठिकाना और उसका फोन नंबर माँ को बताया था।
“क्या माँ बनने वाली है रीना?” मैंने माँ से पूछा।
“हाँ, तीसरा महीना चल रहा है। पता नहीं क्या होगा, जचकी कहाँ होगी?” माँ यह कहते हुए सोच में पड़ गई थी। परेशानी उसके चेहरे पर साफ नजर आ रही थी।
“उसकी सास यहाँ से चली जाएगी, नहीं तो वह उसे यहाँ लाकर जचकी करवा लेगा,” मैंने माँ से कहा।
“यहाँ तो उसे ला नहीं सकते, ना ही जचकी होने पर अस्पताल जा सकते हैं,” माँ ने कहा। पिता के साथ मतभेद होने पर हम उसके विषय में घर में चर्चा भी नहीं कर सकते थे। पिताजी का व्यवहार भी ऐसा ही था। एक आदर्श पिता की छवि से वे कोसों दूर थे। हम सभी भाई सिर्फ जरूरत की ही बातें उनके साथ किया करते थे।
मेरा अपना भी शहर में व्यापार था, जिसमें उपयोग होने वाले सामान के लिए मैं बहुत दिनों से दिल्ली जाने की सोच रहा था। बच्चे छोटे हैं, और पिताजी का दुकान में बैठना नहीं हो पाता। मेरे जाने से दुकान चार-पाँच दिन बंद करनी पड़ती, यही सोचकर मैं नहीं जा पा रहा था। बहुत जरूरी होने पर आखिर मैंने जाने का सोच लिया। गोंडवाना एक्सप्रेस का रिजर्वेशन मिलने पर मैं दिल्ली की यात्रा पर निकल पड़ा। बहुत दिनों बाद मैं लंबी और दिल्ली की यात्रा कर रहा था।
अकेली यात्रा में मुझे बोर न लगे, इसलिए कुछ पत्रिकाएँ मैंने पढ़ने के लिए रख ली थीं, लेकिन दिन में ट्रेन में हो रहे शोर के कारण नहीं पढ़ पाया और रात में एक-दो पेज ही पढ़ा था कि मुझे नींद आने लगी। मैं अपनी ऊपर की बर्थ पर जाकर लेट गया।
सुबह उठा तो देखा पलवल स्टेशन पर गाड़ी खड़ी थी। पंद्रह मिनट के बाद गाड़ी रवाना हुई। गाड़ी करीब एक घंटे लेट हो चुकी थी। साढ़े आठ बजे के बाद ही गाड़ी निजामुद्दीन स्टेशन पहुँची। वहाँ से उतरकर मुझे नई दिल्ली जाना था। मैंने ऑटो को आवाज दी और पहाड़गंज चौराहे के लिए उसे तय कर लिया। वह कुछ ज्यादा पैसे माँग रहा था, थकान की वजह से मैंने कोई मोलभाव नहीं किया। बीस मिनट के बाद ऑटो वाले ने एक चौक में रोका और कहा, “बाबूजी, यह सामने रहा वृहन महाराष्ट्र मंडल।” उसने पहाड़गंज चौराहे पर थाने के सामने अपनी ऑटो रोकी थी।
जेब से पैसे निकालकर मैंने ऑटो वाले को दिए और सूटकेस लेकर सड़क पार किया ही था कि एक स्कूटर मेरे सामने आकर रुकी। स्कूटर वाले ने अपना हेलमेट निकाला तो मैंने देखा कि मेरा छोटा भाई पवन मेरे सामने था।
“आप?” उसने मेरे पाँव छुए और मुझसे लिपट गया। मेरी आँखों में आँसू थे। मेरी गोद में खेला मेरा छोटा भाई जिससे तीन साल बाद मिल रहा था। हम दोनों ने अपनी-अपनी आँखें पोंछीं।
“आप यहाँ आए, मुझे बताया भी नहीं। माँ से तो बात होती है, माँ ने भी नहीं बताया,” उसने नाराजगी जताई, “और यहाँ कहाँ जा रहे हैं?”
“महाराष्ट्र भवन में ठहरने के लिए मुझे राजेश ने बताया था,” मैंने मित्र का नाम लिया।
“चलिए घर चलते हैं,” उसने अधिकार से कहा। मुझसे कहा भी नहीं गया कि मैं घर में नहीं ठहरूँगा। मैं उसकी स्कूटर के पीछे बैठ गया। स्कूटर स्टार्ट करके उसने अपने घर की तरफ बढ़ा दिया।
लगभग पाँच-सात मिनट बाद किसी वजह से उसने स्कूटर रोकी तो मैंने पूछा, “घर कहाँ है?”
“लक्ष्मी नगर में, यमुना पार,” उसने जवाब दिया।
इतनी भीड़, चारों तरफ गाड़ियाँ ही गाड़ियाँ और आदमियों का दौड़ता हुआ हुजूम। यह शहर थकता नहीं है। अब हम दरियागंज की सड़क पर थे। मेरा जाना-पहचाना स्थान है। थोड़ी देर बाद हम यमुना पुल पार कर रहे थे। एक जगह बाईं तरफ एक बोर्ड लगा था जिसमें लिखा था “यहाँ हाथी बिकते हैं।”
पढ़कर मुझे हँसी आ गई। कुछ समय पश्चात चौक से बाईं तरफ भाई ने स्कूटर मोड़ दी। थोड़ी दूर पर उसका ऑफिस और दुकान थी। उसने मुझे अपने व्यापार से संबंधित सामान दिखाया। दो मिनट बाद एक चार मंजिला फ्लैट के पास भाई ने स्कूटर खड़ी की। हम ऊपर चढ़े, प्रथम मंजिल पर ही उसका फ्लैट था। दरवाजा एक महिला ने खोला।
“बड़े भैया आए हैं,” भाई ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा। बहू ने चरण स्पर्श किए। “सदा सुखी रहो” का एक रटा-रटाया सा आशीर्वाद मैंने दिया। उसने सिर ढँक लिया।
“मम्मी जी कैसी हैं?”
“ठीक हैं, थोड़ा नरम-गरम चलता रहता है,” इतना कहकर मैं सामान एक किनारे रखकर सोफे पर बैठ गया।
“आप मुँह-हाथ धो लीजिए, मैं चाय-नाश्ता बनाती हूँ,” कहकर बहू किचन में चली गई। मैं बाथरूम में फ्रेश होने और नहाने चला गया।
बीस मिनट बाद मैं बाहर निकला तो बहू बोली, “भाई साहब, कुछ कपड़े हैं तो दे दीजिए, धोबी आता ही होगा, वह इस्तरी करके ला देगा। धोने के हों तो वह भी निकाल दीजिए।” बहू फिर किचन में चली गई।
“मैं दुकान से आता हूँ। आप नाश्ता कर लीजिए, मैंने अभी थोड़ी देर पहले ही किया है,” कहकर भाई दुकान चला गया।
मैंने इस्तरी करने वाले कपड़े निकालकर एक टेबल पर रख दिए। बहू ने नाश्ता और चाय लाकर रख दी। नाश्ता करते हुए उसने घर का हालचाल पूछा, मैंने भी घर की स्थिति से अवगत करा दिया।
थोड़ी देर आराम करने के बाद मैं भी भाई की दुकान पर चला गया, जो घर के पास ही थी। दुकान में ग्राहकों का आना-जाना लगा था और वह उनसे बात करने में व्यस्त था। मैं पास ही घूमने के लिए निकल गया, फिर बस में बैठकर पहाड़गंज दुकान का सामान खरीदने के लिए चला गया। घूमकर मैं सात बजे शाम को लौटा।
घर आया तो भाई ने चिंता जताई, “कहाँ चले गए थे आप? मुझे लग रहा था कहीं रास्ता भटक न जाओ।”
“कहीं नहीं, बस आसपास गया था। दुकान का कुछ जरूरी सामान खरीदा है,” मैंने संक्षेप में जवाब दिया।
“रात के कितने बजे खाना खाते हैं भाई साहब?”
“कोई जल्दी नहीं, नौ बजे ही खाना होता है रात का।”
मैं बाथरूम चला गया। हाथ-मुँह धोकर बाहर निकला। हाल में भाई टीवी पर समाचार देख रहा था, मैं भी बैठकर देखने लगा। देखते-देखते साढ़े आठ बज गए। बहू ने हम दोनों के लिए खाना परोस दिया।
खाना खाकर मैं थोड़ी देर बाहर टहलने चला गया। आधे घंटे बाद घर पहुँचा। रात के पौने दस बज रहे थे। भाई से थोड़ी चर्चा के बाद मैं हॉल में सो गया।
नींद खुली तो देखा घड़ी साढ़े पाँच बजा रही थी। इस समय मैं सुबह की सैर में निकल जाता हूँ, अब यहाँ उठा तो दरवाजे के खुलने-बंद होने से कहीं इनकी नींद न टूट जाए, यह सोचकर मैं बिस्तर पर पत्रिका लेकर पढ़ते बैठा रहा। पौन घंटे बाद बहू ने मुझे जागा देखा तो कहा, “भाई साहब, चाय बना कर लाऊँ या ब्रश करने के बाद पिएँगे?”
“चाय पीकर ही फ्रेश होने के लिए जाऊँगा,” कहकर निश्चिंत बैठा रहा।
सुबह के करीब साढ़े छह बज रहे थे। थोड़ी देर बाद भाई अखबार लेकर आ गया।
“नींद लगी रात को या करवट बदलते रहे?” भाई ने पूछा और अखबार मेरे हाथ में दिया।
“नींद तो अच्छी लगी। सीधे सुबह साढ़े पाँच ही उठा,” इतना कहकर मैं अखबार पढ़ने लगा। भाई भी अंदर का पेज लेकर पढ़ रहा था। बहू ने चाय लाकर दी। हम दोनों ने चाय पी।
थोड़ी देर बाद मैं मंजन करने और नहाने के लिए बाथरूम चला गया। आधे घंटे बाद मैं बाथरूम से बाहर निकला। मैं कल के पहने हुए कपड़ों में ही डायरी लेकर बैठ गया।
थोड़ी देर बाद बहू ने नाश्ता लगा दिया। नाश्ता करके मैं उठा और बहू से पूछा, “मेरे कपड़े कहाँ रखे हैं?”
“हाल की आलमारी में रखे हैं भाई साहब, आप निकाल लीजिए। आलमारी खुली है।”
मैंने अलमारी खोली तो देखा भाई के पैंट-शर्ट और कमीजें रखी हैं। मैंने अंदाजा लगाया कि करीब पचास-साठ से भी ज्यादा कमीजें, टी-शर्ट और पैंट से आलमारी भरी हुई थी। मैं देखकर अवाक रह गया। सभी कमीजें एक से सुंदर चेक वाली थीं। लगा अपनी उन पुरानी कमीजों की जगह तीन नई कमीजें या कोई भी तीन कमीज रख लूँ, तो भी पता नहीं चलेगा। पता चलने पर गलती से रख लिया भी कहा जा सकता है।
मैंने अपनी एक कमीज पहनी और तीन कमीजें जो करीने से जमी हुई रखी थीं, उनमें से निकालकर अपने सूटकेस में रख लीं। काफी दिनों से मैंने कोई कपड़े नहीं बनवाए थे, क्योंकि दुकान में काफी लागत लगी हुई थी। मंझला भाई मुझे अक्सर चार-पाँच कमीजें, जो बिलकुल नई सी रहती हैं, लाकर दे देता है। उसे कपड़ों का बहुत शौक है। वह बैंक में नौकरी करता है।
सूटकेस को एक किनारे रखा और भाई से कहा, “मैं जरा बाहर होकर आता हूँ।”
घर से बाहर निकलकर मैं सीधे चौराहे पर पहुँचा और गुरुद्वारे के पास जाकर खड़ा हो गया। सोचने लगा कि मैंने जो तीन कमीजें बिना बताए रख ली हैं, वह सही है या गलत। मैं बड़ा भाई हूँ, चाहूँ तो हक से भी मांग सकता हूँ। ऐसा न लगे बहू को कि बड़े भाई होकर मौका देखकर चोरी करके कपड़े ले गए।
मैं बहुत असमंजस में था। काफी देर तक मैं घूमता रहा और विचारों में उलझा रहा। अंत में मैंने निर्णय किया कि घर पहुँचकर तीनों कमीजें धीरे से जाकर अलमारी में वापस रख दूँगा। जब यह विचार कर रहा था, उस समय मैं गुरुद्वारे के ठीक सामने खड़ा था।
मैं वापस भाई के घर लौटा। शाम हो चुकी थी। दरवाजा बहू ने खोला, “भाई साहब, आप कहाँ चले गए थे? ये फिकर कर रहे थे। आप फ्रेश हो लीजिए, मैं खाना लगा देती हूँ। ये पड़ोसी होटल वाले के साथ किसी काम से गए हैं।” बहू इतना कहकर रसोई में चली गई।
मैं हाल में जाकर अलमारी खोली और अपने बैग से तीनों कमीजें निकालकर उसमें रख दीं। रखने के बाद मैंने अलमारी बंद की तो मुझे हल्का लगा। इतना हल्का जैसे मैं मजे से पानी में तैर रहा हूँ।
खाना खाकर मैं सो गया।
सुबह उठा और भाई से बोला, “मैं वापस जा रहा हूँ। आगरा में एक मित्र से मिलना है।”
अखबार पढ़ना छोड़कर भाई ने आश्चर्य से कहा, “आपकी तो कल की टिकट है, वह भी दोपहर की। फिर आप आज सुबह कैसे जा रहे हैं?”
“एक मित्र मेरी नौकरी के दिनों का साथी है, उसकी तबीयत ठीक नहीं है। उससे मिलकर फिर वहीं से निकल जाऊँगा,” मैंने झूठ कह दिया। मुझे बहुत पश्चाताप हो रहा था। मैंने कहा, “जो भी गाड़ी सुबह की होगी, मैं निकल जाऊँगा। अगले महीने फिर एक काम से आना है।”
मैं अपनी तैयारी में जुट गया। मुझे मालूम था कि हो सकता है मुझे साधारण बोगी में बिना रिजर्वेशन के बैठकर जाना पड़ सकता है। मैं अपना सूटकेस उठाकर बाहर निकला और रेलवे स्टेशन पहुँच गया।
सुधीर कुमार सोनी, सत्ती बाजार, रायपुर (छत्तीसगढ़)



