जंगल

हम मनुष्य सुनने को उतने आतुर नहीं हैं
जितनी आतुरता से जंगल अपनी बात हमसे कहना चाहते हैं
वे हमारी प्रतीक्षा कर रहे हैं और हम उन्हें अनसुना कर रहे हैं।

मैं लगातार सड़क किनारे फैले जंगल की देह के साथ
कदमताल मिलाकर चलता हूँ
चिल्फी-घाटी की सर्पाकार सड़क तक फैले जंगल की देह को
गौर से निहारता हूँ।

मुझे लगता है जैसे वे मुझसे संवाद करना चाहते हैं
उसकी विशाल देह के भीतर घुसते ही मैं उसके सौंदर्य में गुम हो जाता हूँ
उसके सन्नाटे की उपस्थिति इतनी अधिक है कि व्यक्ति
अपना पता-ठिकाना भूल जाए
भूल जाए कि शहर में कोलाहल की भागमभाग भी है।

वृक्ष के गोलाकार तने में हाथ रखते ही लगता है
कि वृक्ष मेरी उंगलियों से होकर मेरी नसों में दौड़ना चाहता है।

पहाड़ की ऊँचाई से उतरते सूखे पत्ते, जिन्हें हवा
अपना साथी बनाकर गले में बाँहें डाले घूमती रहती है
आवारा हवा के प्रेम में पत्ते भी आवारा बन जाते हैं।

दीमकों के घर देखते ही उससे साक्षात्कार करने का मन होता है
उसकी बुनावट मन मोह लेती है।

जंगल के बीच से, उसके सीने को चीरकर गुजरती सड़क
सर्पाकार हो जाती है बार-बार।

अचानक एक चट्टान पूछती है—
“इतने हजारों बरस बाद तुम क्यों चले आए, मेरे सन्नाटे भरे जीवन में
आवाजों और कोलाहल को भरने?”

मैंने जंगल से कहा—
“तुम्हारे पास तो इतनी शांति है, मुझे मेरे शहर के लिए थोड़ी सी दे दो।”

जंगल ने अनसुना कर दिया।
न सुनना हमने ही सीखा है—जंगल ने।

जंगल के वृक्ष, चट्टानें और सूखे पत्ते दिन-रात सन्नाटे बुनते रहते हैं
सन्नाटों में झींगुरों का संगीत स्पष्ट सुनाई देता है रात में।
उसके सन्नाटों को चीरती हैं जंगली जानवरों की डरावनी आवाजें और चीखें।

मैं जंगल के भूगोल में ढूंढता हूँ
जंगली फूल और मधुमक्खी के छत्ते
शहद की मिठास-सा मीठा दुनिया में और कुछ भी नहीं।

जंगल का मौन सौंदर्य इतना कुछ बयान करता है
कि आप उसे दर्ज नहीं कर पाएंगे।

जंगल की देह में पसरी चट्टानों में जंगल
अपनी कलाकृति उकेरता है
उकेरता है वृक्षों के टूटकर गिरे सूखे पत्तों में।

कलाकृति देखकर लगता है कि जंगल के पास
जंगलीपन के अतिरिक्त एक स्वस्थ हृदय भी है।


सुधीर कुमार सोनी, रायपुर
छत्तीसगढ़

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