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‘हमने अपना काम किया’: जस्टिस गवई ने क्रीमी लेयर की गेंद केंद्र के पाले में डाली

राजीव रंजन नाग: नई दिल्ली। भारत के चीफ़ जस्टिस बी.आर. गवई ने आज कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने जाति-आधारित आरक्षण में क्रीमी लेयर के मुद्दे को सुलझाने के लिए अपना काम कर दिया है, और अब अगला कदम सरकार और संसद को उठाना है। चीफ़ जस्टिस, जो कल रिटायर हो रहे हैं, ने आज दोपहर मीडिया से बात की और न्यायपालिका तथा टॉप कोर्ट के सामने मौजूद मुख्य मुद्दों पर सवालों के जवाब दिए।

क्रीमी लेयर का सवाल

पिछले साल सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने एक अहम फ़ैसला सुनाया था, जिसमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के अंदर सब-क्लासिफिकेशन को मंज़ूरी दी गई थी, ताकि आरक्षण का फ़ायदा कमज़ोर तबके तक पहुँच सके। चीफ़ जस्टिस गवई — तब जस्टिस गवई — उस बेंच का हिस्सा थे। अपने रिटायरमेंट से एक दिन पहले इस मुद्दे पर बोलते हुए चीफ़ जस्टिस ने कहा कि न्यायपालिका ने “अपना काम कर दिया है” और अब यह सरकार और संसद की ज़िम्मेदारी है कि वे कोटा-आधारित आरक्षण में सब-क्लासिफिकेशन लागू करें, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि “एक क्लास के अंदर एक क्लास न बने।”

चीफ़ जस्टिस गवई देश के शीर्ष न्यायिक पद पर पहुँचने वाले सिर्फ़ दूसरे दलित हैं। उन्होंने कहा, “लोगों तक बराबरी पहुंचनी चाहिए। हमने देखा है कि कई शेड्यूल्ड कास्ट परिवार बड़े हुए हैं, लेकिन वे आरक्षण का फ़ायदा उठाते रहते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि SC/ST समुदाय के कुछ IAS अफ़सरों के बच्चे भी कोटा-बेस्ड फ़ायदे चाहते हैं।

अपने फ़ैसले में जस्टिस गवई ने पिछले साल लिखा था, “राज्य को SC/ST कैटेगरी में क्रीमी लेयर की पहचान करने और उन्हें आरक्षण/अफर्मेटिव एक्शन से बाहर करने की नीति बनानी चाहिए। सच्ची बराबरी पाने का यही एकमात्र तरीका है।

न्यायिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद?

चीफ़ जस्टिस गवई, जो पहली पीढ़ी के न्यायविद हैं, से कॉलेजियम सिस्टम के ज़रिए न्यायिक नियुक्तियों में भाई-भतीजावाद और पक्षपात के आरोपों पर सवाल पूछा गया। कॉलेजियम प्रणाली लंबे समय से विवाद का विषय रही है — आलोचकों का कहना है कि यह पारदर्शी नहीं है, जबकि समर्थक इसे कार्यपालिका के दखल से न्यायपालिका की सुरक्षा बताते हैं।

चीफ़ जस्टिस ने कहा कि वे मामले, जिनमें किसी जज के रिश्तेदार का नाम कॉलेजियम के सामने आता है, कुल नियुक्तियों का 10 प्रतिशत भी नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि किसी उम्मीदवार की मेरिट को सिर्फ़ इसलिए नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता क्योंकि वह किसी जज का रिश्तेदार है।

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बोलते हुए चीफ़ जस्टिस ने उस “सोच” की आलोचना की जो यह मानती है कि जब तक कोई जज सरकार के खिलाफ़ फ़ैसला नहीं देता, तब तक वह “स्वतंत्र जज” नहीं है।

भविष्य की योजनाएँ

चीफ़ जस्टिस ने कहा कि रिटायरमेंट के बाद वे कुछ समय आराम करेंगे। इसके बाद वे सोशल वर्क में शामिल हो सकते हैं। उन्होंने कहा, “सोशल वर्क मेरे खून में है और मैं अपना समय आदिवासियों को दूंगा।” साथ ही स्पष्ट किया, “मैं रिटायरमेंट के बाद कोई भी पद स्वीकार नहीं करूंगा।” कल जस्टिस सूर्यकांत चीफ़ जस्टिस का पद संभालेंगे।

चीफ़ जस्टिस ने उस हालिया घटना पर भी जवाब दिया, जिसमें एक वकील ने सुनवाई के दौरान उन पर जूता फेंका था। यह पूछे जाने पर कि उस वकील के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई, उन्होंने कहा, “माफ़ी मेरे लिए अपने आप आ गई। उसके खिलाफ कार्रवाई न करने का फ़ैसला तुरंत ले लिया गया था।”

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