लखनऊ । बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय में विश्व मानवाधिकार दिवस के अवसर पर मानवाधिकार विभाग एवं सेंटर ऑफ पोस्ट ग्रेजुएट लीगल स्टडीज के संयुक्त तत्वावधान में ‘मानवाधिकार: हमारी दैनिक आवश्यकताएँ – राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य’ विषय पर एक दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। मुख्य अतिथि के तौर पर विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय संगठन मंत्री हेमचंद्र उपस्थित रहे। इसके अतिरिक्त मंच पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर उत्तर प्रदेश लॉ कमीशन के चेयरपर्सन जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कार्यवाहक कुलपति प्रो. एस. विक्टर बाबू, फोरम फॉर ग्लोबल स्टडीज के फाउंडिंग डायरेक्टर एवं साउदर्न फ्रेडरल यूनिवर्सिटी, रशिया के विजिटिंग प्रोफेसर डॉ. संदीप त्रिपाठी, प्रो. प्रीति मिश्रा एवं मानवाधिकार विभाग के विभागाध्यक्ष और कार्यक्रम संयोजक प्रो. शशि कुमार उपस्थित रहे। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन एवं बाबासाहेब के छायाचित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। विश्वविद्यालय कुलगीत गायन के पश्चात आयोजन समिति की ओर से अतिथियों एवं शिक्षकों को पुष्पगुच्छ भेंट करके उनका स्वागत किया। सर्वप्रथम प्रो. प्रीति मिश्रा ने कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों का स्वागत किया। साथ ही प्रो. शशि कुमार ने सभी को कार्यक्रम के उद्देश्य एवं रुपरेखा से अवगत कराया।
मुख्य अतिथि एवं विद्या भारती पूर्वी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रीय संगठन मंत्री हेमचंद्र ने सभी को संबोधित करते हुए कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की वास्तविक प्रगति तभी संभव है, जब वहाँ सशक्त, पारदर्शी तथा सुशासन प्रदान करने वाली सरकार कार्यरत हो। सुशासन ही वह आधार है, जिस पर राष्ट्र विकास, सामाजिक न्याय और नागरिकों के कल्याण की संरचना खड़ी होती है। इसी के साथ भारतीय सभ्यता सदैव से व्यक्ति के नैतिक उत्थान, समानता और समाज में समरसता की स्थापना पर बल देती आई है। उन्होंने कहा कि हमारी परंपरा प्रज्ञा, शील और करुणा जैसे गुणों को मानव जीवन की आधारशिला मानती है, क्योंकि इन्हीं गुणों के माध्यम से समाज में सौहार्द, सहयोग और संतुलन की भावना विकसित होती है। व्यक्ति की उन्नति केवल बाहरी साधनों से नहीं, बल्कि उसकी सद्बुद्धि, उत्तरदायित्व-बोध और मूल्यबद्ध आचरण से निर्धारित होती है। दूसरी ओर, मानवाधिकार सार्वभौमिक, अविभाज्य और अनिवार्य हैं और केवल कानूनी दस्तावेजों तक सीमित न रहकर वैश्विक स्तर पर मानव गरिमा की रक्षा का आधार बनते हैं। अतः सुशासन, नैतिकता, समानता और मानवाधिकार ये सभी मिलकर एक ऐसे प्रगतिशील, शांतिपूर्ण और मानवीय समाज की रचना करते हैं जहाँ व्यक्ति और राष्ट्र, दोनों का संतुलित विकास संभव हो पाता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. विक्टर बाबू ने मानवाधिकार दिवस के अवसर पर कहा कि मानवाधिकार केवल अधिकारों की सूची नहीं, बल्कि मानवता को उन्नत करने का वह नैतिक आधार है, जो प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, स्वतंत्रता और न्याय के साथ जीने का अवसर देता है। उन्होंने कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में यह और भी आवश्यक हो गया है कि हम विविधताओं का सम्मान करें, संवेदनशीलता को बढ़ाएँ और समाज में सहभागिता की भावना विकसित करें। मानवाधिकार तभी सार्थक होते हैं जब हम उन्हें व्यवहार में उतारें और हर व्यक्ति के जीवन में समान अवसर एवं गरिमा सुनिश्चित करें। उन्होंने सभी नागरिकों से अपील की कि मानवाधिकार दिवस को केवल उत्सव के रूप में नहीं, बल्कि मानव कल्याण के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः सुदृढ़ करने के अवसर के रूप में देखें।
विशिष्ट अतिथि एवं उत्तर प्रदेश लॉ कमीशन के चेयरपर्सन जस्टिस श्री प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने अपने विचार रखते हुए कहा कि मानवाधिकार किसी भी सभ्य समाज की प्रगति का मूल आधार हैं। मानवाधिकार न केवल व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं, बल्कि उसे अपनी क्षमताओं का विकास करने, सामाजिक जीवन में सक्रिय सहभागिता निभाने और सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अवसर भी प्रदान करते हैं। जिस समाज में मानवाधिकारों की समझ और स्वीकृति प्रबल होती है, वहाँ सामाजिक सद्भाव, विश्वास और सहयोग स्वतः विकसित होता है। जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि मानवाधिकारों की वास्तविक रक्षा तभी संभव है जब समाज के भीतर क्षमा-भाव और आपसी सम्मान की भावना प्रबल हो। जिस समाज में क्षमा की संस्कृति जीवित रहती है, वहाँ दूसरों के अधिकारों का हनन करना अत्यंत कठिन हो जाता है, क्योंकि वहाँ मनुष्यता और संवेदना सर्वाेपरि होती है। इसलिए आवश्यक है कि हम शांति को केवल एक आदर्श न मानें, बल्कि एक मूल सामाजिक मूल्य के रूप में अपनाएँ एवं शांतिपूर्ण समाज की स्थापना करें।
फोरम फॉर ग्लोबल स्टडीज के फाउंडिंग डॉ. संदीप त्रिपाठी ने बताया कि मानवाधिकार केवल संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान, स्वतंत्रता, समानता और सुरक्षित जीवन की मूल आधारशिला हैं। मानवाधिकार ही यह तय करते हैं कि समाज में व्यक्ति की गतिशीलता और उसका जीवन-ढंग कैसा होगा यानी वह किस प्रकार अपनी गरिमा, स्वतंत्रता और मूलभूत स्वतंत्रताओं के साथ जीवन व्यतीत कर सकता है। इसीलिए मानवाधिकारों की रक्षा केवल कानूनी दायित्व नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनशीलता और सामाजिक जागरूकता का अनिवार्य भाग है। उन्होंने कहा कि मानवाधिकार दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब प्रत्येक नागरिक, उसकी जाति, धर्म, लिंग, पहचान, क्षमता या पृष्ठभूमि चाहे जो भी हो, समान अवसरों, सुरक्षा और सम्मान के साथ आगे बढ़ सके। इसीलिए आज आवश्यकता है कि हम मानवाधिकारों को पुस्तकीय अवधारणाओं से आगे बढ़ाकर अपने व्यवहार, नीतियों और सामाजिक सरोकारों में उतारें, ताकि न्याय, समानता और सह-अस्तित्व पर आधारित एक समतामूलक समाज का निर्माण हो सके।
इस अवसर पर अतिथियों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी के सोवेनियर का विमोचन भी किया गया। साथ ही प्रतिभागियों के लिए प्लेनरी एवं तकनीकी सत्र का आयोजन किया गया, जिसमें विभिन्न प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिभागियों ने अपने शोध पत्र प्रस्तुत किये। प्लेनरी एवं तकनीकी सत्र के दौरान वक्ता के तौर पर ऑक्सफोर्ड ब्रुक्स यूनिवर्सिटी, यूनाइटेड किंगडम के प्रो. प्रीतम सिंह, यूनिवर्सिटी ऑफ नाटिंघम के प्रोफेसर ऑफ लॉ प्रो. कीस वैन हरपेन, यूनिसेफ के सोशल पॉलिसी स्पेशलिस्ट प्रो. पियूष एंटनी, लखनऊ विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो. संजय गुप्ता उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के समापन सत्र के दौरान मुख्य अतिथि के तौर पर लखनऊ विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ लॉ के प्रो. बी.डी. सिंह उपस्थित रहे। समापन सत्र के दौरान मानवाधिकारों की महत्ता एवं उपयोगिता पर विस्तृत चर्चा की गयी।
अंत में आयोजन समिति की ओर से अतिथियों को स्मृति चिन्ह एवं शॉल भेंट करके उनके प्रति आभार व्यक्त किया गया। इसके अतिरिक्त डॉ. अजय सिंह कुशवाहा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
समस्त कार्यक्रम के दौरान विभिन्न संकायों के संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षकगण, गैर शिक्षण कर्मचारी, शोधार्थी, प्रतिभागी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।
हमारी दैनिक आवश्यकताएँ – राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य विषयक अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन





