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नाबालिगों के हाथों में ई-रिक्शा, हादसों को खुला न्योता

नीरज चक्रपाणि: हाथरस। शहर का सबसे व्यस्त और संवेदनशील क्षेत्र माना जाने वाला तालाब चौराहा इन दिनों प्रशासनिक लापरवाही और व्यवस्था की विफलता का जीता-जागता उदाहरण बनता जा रहा है। एक ओर प्रदेश सरकार बाल श्रम उन्मूलन और सड़क सुरक्षा को लेकर लगातार सख्त निर्देश जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी हकीकत इन दावों को आईना दिखाती नजर आ रही है। तालाब चौराहे पर नाबालिग बच्चों के हाथों में ई-रिक्शा (मयूरी) की कमान और खुलेआम यातायात नियमों का उल्लंघन प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

हाल ही में तालाब चौराहे पर एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, एक नाबालिग द्वारा तेज रफ्तार में चलाया जा रहा ई-रिक्शा अचानक संतुलन खो बैठा और सामने से आ रहे ट्रक से टकराने से बाल-बाल बच गया। यदि यह टक्कर हो जाती तो कई निर्दोष लोगों की जान जा सकती थी।

घटना के प्रत्यक्षदर्शी एवं सिद्ध गोपाल सेवा ट्रस्ट समिति के संस्थापक सुरेंद्र नाथ चतुर्वेदी ने बताया कि यह घटना न केवल सड़क सुरक्षा की पोल खोलती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि किस प्रकार नियमों को ताक पर रखकर नाबालिगों से व्यावसायिक वाहन चलवाए जा रहे हैं।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि तालाब चौराहा सहित जनपद के अन्य प्रमुख मार्गों पर लंबे समय से नाबालिग चालक बेखौफ होकर ई-रिक्शा चला रहे हैं। इनमें से अधिकांश बच्चों को न तो यातायात नियमों की जानकारी है और न ही किसी प्रकार का प्रशिक्षण। बिना ड्राइविंग लाइसेंस, बिना पंजीकरण और बिना सुरक्षा मानकों के ये वाहन दिनभर सड़कों पर दौड़ते रहते हैं। इससे न केवल उनकी स्वयं की जान खतरे में रहती है, बल्कि राहगीरों, साइकिल सवारों और अन्य वाहन चालकों के लिए भी स्थिति अत्यंत जोखिमभरी बन चुकी है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि संबंधित विभागों की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। एआरटीओ विभाग, यातायात पुलिस और बाल श्रम विभाग की मौजूदगी के बावजूद खुलेआम नियमों का उल्लंघन होना प्रशासनिक निष्क्रियता को उजागर करता है। क्षेत्रीय लोगों का आरोप है कि कार्रवाई के नाम पर केवल औपचारिकताएं निभाई जाती हैं, जबकि जमीनी स्तर पर कोई ठोस कदम उठता दिखाई नहीं देता। नागरिकों के बीच यह चर्चा आम है कि आखिर किसके संरक्षण में नाबालिग बच्चे सार्वजनिक सड़कों पर व्यावसायिक वाहन चला रहे हैं।

जनपद के चौराहों पर यातायात व्यवस्था भी पूरी तरह चरमराई हुई है। अव्यवस्थित तरीके से ई-रिक्शा खड़े करना, बीच सड़क पर सवारियां उतारना और मनमाने ढंग से वाहन मोड़ना यहां की रोजमर्रा की तस्वीर बन चुकी है। इसके कारण आए दिन लंबा जाम लग जाता है, जिससे आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। स्कूली बच्चे, बुजुर्ग और मरीज घंटों जाम में फंसे रहते हैं, लेकिन स्थिति को संभालने के लिए न तो ट्रैफिक पुलिस की सक्रियता दिखाई देती है और न ही किसी प्रकार की सख्त निगरानी।

स्थानीय व्यापारियों और राहगीरों का कहना है कि ‘नो एंट्री’ के समय में भी भारी ट्रकों का शहर के भीतर प्रवेश अब सामान्य बात हो गई है। जब भारी वाहन और नाबालिगों द्वारा चलाए जा रहे ई-रिक्शा एक ही समय में संकरी सड़कों पर आ जाते हैं, तो हादसे की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। इसके बावजूद न तो ट्रकों के प्रवेश पर प्रभावी रोक लगाई जा रही है और न ही नाबालिग चालकों पर कोई ठोस कार्रवाई हो रही है।

बाल श्रम उन्मूलन को लेकर सरकार के दावों के बीच यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है। नाबालिगों से ई-रिक्शा चलवाना न केवल यातायात नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह सीधे तौर पर बाल श्रम की श्रेणी में भी आता है। इसके बावजूद बाल श्रम विभाग की निष्क्रियता सवालों के घेरे में है। स्थानीय लोगों का कहना है कि विभागीय अधिकारी शायद ही कभी मौके पर आकर स्थिति का जायजा लेते हों, जबकि समस्या खुलेआम सड़कों पर दिखाई दे रही है।

जनपद की सड़कों पर जिस तरह कानून का भय समाप्त होता नजर आ रहा है, वह न केवल स्थानीय प्रशासन बल्कि पूरे तंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्था की सच्चाई को बिना किसी पर्दे के सामने रखती है और समय रहते ठोस कार्रवाई की मांग करती है।

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