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संक्षिप्त परिचय: प्रशांत कुमार मिश्रा महाप्रबंधक, आधुनिक रेल डिब्बा कारखाना, रायबरेली एवं महाप्रबंधक, रेल कोच फैक्ट्री, कपूरथला

प्रशांत कुमार मिश्रा भारतीय रेल यांत्रिक अभियंता सेवा (IRSME) के वरिष्ठ अधिकारी हैं। वे न केवल एक अनुभवी इंजीनियरिंग प्रशासक हैं, बल्कि देश के प्रमुख रेलवे एवं औद्योगिक विरासत इतिहासकारों में भी उनका महत्वपूर्ण स्थान है। अपने विशिष्ट सेवा-काल में उन्होंने इंजीनियरिंग नेतृत्व को भारतीय रेलवे की ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण से सफलतापूर्वक जोड़ा है। वे रेलवे नेटवर्क को केवल इस्पात और भाप की संरचना न मानकर राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी विकास का जीवंत दस्तावेज मानते हैं।

पूर्वी रेलवे के आसनसोल एवं मालदा मंडलों में मंडल रेल प्रबंधक के रूप में कार्य करते हुए श्री मिश्रा ने पचास से अधिक ऐतिहासिक रेलवे संरचनाओं के पुनर्स्थापन का नेतृत्व किया। इनमें भारत का प्रथम रेलवे संस्थान ड्यूरंड इंस्टीट्यूट, राजमहल स्टेशन तथा साहिबगंज स्थित नदी तट के ऐतिहासिक बंगले प्रमुख हैं। स्व-वित्तपोषित और अनुकूल पुनः उपयोग (एडेप्टिव रीयूज़) के उनके अभिनव मॉडल के माध्यम से जर्जर औपनिवेशिक इमारतों को स्काउट डेंस, सभागार, क्लब, गैंग हट्स और रेलवे कार्यालयों जैसे सक्रिय सार्वजनिक स्थलों में परिवर्तित किया गया, जिससे विरासत संरक्षण आत्मनिर्भर बना और रेलवे के दैनिक जीवन से जुड़ सका।

दक्षिण पश्चिम रेलवे में अतिरिक्त महाप्रबंधक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने इस अभियान को दक्षिण भारत तक विस्तार दिया। इस दौरान हुबली में रेलवे संग्रहालय की स्थापना, मैसूर रेलवे संग्रहालय के नवीनीकरण, सीएसआर सहयोग से बेंगलुरु मंडल के पाँच विरासत स्टेशनों के पुनर्स्थापन तथा कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड़ स्थित 130 वर्ष पुरानी विरासत घड़ी के पुनर्जीवन का कार्य उनके नेतृत्व में संपन्न हुआ। उनका समावेशी और हितधारक-आधारित दृष्टिकोण भारतीय रेल के संचालन एवं विकासात्मक ढांचे में विरासत संरक्षण को सहज रूप से पिरोता है।

एक विपुल लेखक और गहन शोधकर्ता के रूप में श्री मिश्रा ने भारतीय रेलवे इतिहास, इंजीनियरिंग और विरासत प्रबंधन पर व्यापक लेखन किया है। उनके शोध कार्यों में सदर्न मराठा रेलवे, वेस्ट ऑफ इंडिया पुर्तगाली गारंटीड रेलवे, संथाल विद्रोह और पूर्वी भारतीय रेलवे, तथा पूर्वी भारत की प्रारंभिक सुरंगों और रेलगाड़ियों पर महत्वपूर्ण अध्ययन शामिल हैं। वे संशोधित डीज़ल मेंटेनेंस मैनुअल के सहयोगी संपादक रहे हैं और रेलवे विरासत पर दो चर्चित कॉफी टेबल पुस्तकों के लेखक हैं। उनका निबंध “फर्स्ट ट्रेन टू रानीगंज” डॉर्लिंग किंडर्स्ले (पेंगुइन रैंडम हाउस, बर्टेल्समैन एजी) द्वारा प्रकाशित किया गया है।

वर्तमान में उन्होंने प्राथमिक अभिलेखीय स्रोतों पर आधारित पूर्वी भारतीय रेलवे पर एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ का लेखन पूर्ण किया है। साथ ही, आधुनिक रेल डिब्बा कारखाना, रायबरेली में एक रेलवे हेरिटेज पार्क का विकास किया गया है, जो एक सक्रिय उत्पादन इकाई को रेलवे विकास के जीवंत संग्रहालय में परिवर्तित करने की एक अनूठी और महत्वाकांक्षी पहल है।

पुस्तकों के बारे में

  1. Rails Through Raj: The East Indian Railway (1841–1861)
    यह पुस्तक पूर्वी भारतीय रेलवे के प्रारंभिक वर्षों (1841–1861) का अब तक का सबसे व्यापक और प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करती है। पूरी तरह प्राथमिक स्रोतों पर आधारित यह कृति रेलवे की उत्पत्ति को साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं से लेकर राष्ट्रीय रूपांतरण तक के परिप्रेक्ष्य में रखती है। इसमें इंजीनियरिंग उपलब्धियों, औपनिवेशिक राजनीति, गुमनाम श्रमिकों और दूरदर्शी सुधारकों की भूमिका को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। यह केवल रेलगाड़ियों की कहानी नहीं, बल्कि उस लौह-पथ की गाथा है जिसने भारत के भूगोल, अर्थव्यवस्था और नियति को नया आकार दिया। यह पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।
  2. Tracks of Necessity: Railways, Famine and Empire in the Deccan
    यह पुस्तक दक्षिणी मराठा रेलवे (SMR) और वेस्ट ऑफ इंडिया पुर्तगाली गारंटीड रेलवे (WIPGR) का विस्तृत इतिहास प्रस्तुत करती है। कठिन परिस्थितियों में जन्मी दक्षिणी मराठा रेलवे एक विशाल “फूड फॉर वर्क” परियोजना के रूप में विकसित हुई और अकाल-पीड़ित क्षेत्रों के लिए जीवनरेखा साबित हुई। साथ ही, WIPGR ने ब्रिटिश भारत को पुर्तगाली गोवा से जोड़ते हुए धारवाड़ के कपास क्षेत्रों से मर्मुगाओ के गहरे बंदरगाह तक संपर्क स्थापित किया। उपेक्षित अभिलेखों के आधार पर यह पुस्तक महत्वाकांक्षा, राजनीतिक समझौतों, अथक अभियंताओं और निवेशकों की कहानियों को जीवंत करती है।
  3. The Highway of Hindostan: The East Indian Railway (1841–1871)
    यह पुस्तक ईस्ट इंडियन रेलवे के प्रारंभिक तीन दशकों (1841–1871) का सबसे विस्तृत और प्रामाणिक इतिहास प्रस्तुत करती है। प्राथमिक स्रोतों पर आधारित यह कृति दिखाती है कि किस प्रकार रेलवे ने साम्राज्यवादी परियोजना से आगे बढ़कर पूरे उपमहाद्वीप के सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन में निर्णायक भूमिका निभाई।

उपरोक्त पुस्तकों में से हाल ही में दो पुस्तकों का विमोचन ‘रेल उत्सव’ के अवसर पर कलकत्ता यूनिवर्सिटी इंस्टिट्यूट, कोलकाता में रेल उत्साही समाज द्वारा आयोजित कार्यक्रम में किया गया। शीघ्र ही ये पुस्तकें अमेज़न और फ्लिपकार्ट पर भी उपलब्ध होंगी।

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