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मौसम बदलाव से सरसों व आलू की फसल पर रोग–कीट का खतरा बढ़ा

हाथरस। मौसम में अचानक आए बदलाव के चलते सरसों और आलू की फसलों पर रोग एवं कीट प्रकोप का खतरा बढ़ गया है। जिला कृषि रक्षा अधिकारी निखिल देव तिवारी ने बताया कि वरिष्ठ प्राविधिक सहायक कृषि रक्षा रमेश चन्द्र वर्मा द्वारा मुरसान विकास खंड के ग्राम विशुनदास, भगतुआ, गारवगढ़ी, नगला हीरा सिंह, माह का नगला सहित अन्य क्षेत्रों में कीट एवं रोग सर्वेक्षण किया गया।

सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि यदि मौजूदा मौसम कुछ दिनों तक बना रहा तो सरसों की फसल में तना सड़न, अल्टरनेरिया पत्ती धब्बा, सफेद गेरूई, तुलासिता तथा माहूँ कीट का प्रकोप हो सकता है। वहीं आलू की फसल में तना सड़न और पछेती झुलसा रोग की संभावना अधिक बनी हुई है। अधिकारियों ने बताया कि जिन किसानों ने बीज शोधन कर बुवाई नहीं की है, उनके खेतों में रोग व कीट प्रकोप अधिक दिखाई दे सकता है, जिससे फसल को भारी नुकसान होने की आशंका है।

कृषि विभाग ने किसानों को सलाह दी है कि सरसों की फसल में तना काला होकर सड़ना, पत्तियों व फलियों पर गहरे कत्थई धब्बे, पत्तियों की निचली सतह पर सफेद फफोले या माहूँ कीट की उपस्थिति जैसे लक्षण दिखाई देने से पहले ही रसायनों का छिड़काव करें। नियंत्रण के लिए मैकोजेब, जिनेब या कापर ऑक्सी क्लोराइड का अनुशंसित मात्रा में प्रयोग करने की सलाह दी गई है। माहूँ कीट के नियंत्रण के लिए डाइमेथोएट, क्लोरोपाइरीफॉस या नीम तेल आधारित दवाओं के प्रयोग की सिफारिश की गई है।

आलू की फसल में तना सड़न और पछेती झुलसा रोग के लक्षण दिखाई देने पर सिंचाई रोकने, संक्रमित डंठलों को काटकर नष्ट करने तथा अनुशंसित फफूंदनाशकों का 8 से 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने की सलाह दी गई है। अधिक प्रकोप की स्थिति में जैविक नियंत्रण उपाय अपनाने पर भी जोर दिया गया है।

कृषि विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे समय रहते फसलों की नियमित निगरानी करें और विभागीय सलाह के अनुसार उपचार कर फसल को होने वाले नुकसान से बचाएं।

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