भारत की विदेश नीति और क्षेत्रीय रणनीति में चाबहार बन्दरगाह अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह बन्दरगाह न केवल भारत को मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान तक पहुँच का विकल्प देता है, बल्कि पाकिस्तान को बाईपास करने की रणनीतिक सुविधा भी प्रदान करता है। हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा ईरान के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 25 फ़ीसदी टैरिफ़ लगाने की घोषणा ने वैश्विक व्यापार के समीकरणों को झकझोर दिया है। इस फैसले के बाद यह सवाल प्रमुखता से उठने लगा कि भारत पर इसका क्या असर होगा, विशेषकर चाबहार परियोजना के सन्दर्भ में?
भारत और ईरान के बीच व्यापार पहले से ही अमेरिकी प्रतिबन्धों के कारण सीमित रहा है। लेकिन ईरान भारत की भू-राजनीतिक योजनाओं में एक केन्द्रीय भूमिका निभाता है। चाबहार बन्दरगाह, जो ईरान के सिस्तान-बालूचिस्तान प्रान्त के दक्षिणी तट पर स्थित है, भारत की क्षेत्रीय रणनीति का केन्द्र है। भारत और ईरान मिलकर इस बन्दरगाह को विकसित कर रहे हैं| ताकि भारत को मध्य एशिया और अफ़ग़ानिस्तान तक सीधी पहुँच मिल सके। यह बन्दरगाह भारत के लिए पाकिस्तान को बाईपास करते हुए व्यापार और सम्पर्क का विकल्प देता है, जो भारत की सुरक्षा और रणनीतिक हितों के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
चाबहार बन्दरगाह की विशेषता यह है कि यह ईरान का एकमात्र गहरे पानी वाला पोर्ट है, जहाँ बड़े जहाज़ आसानी से आ-जा सकते हैं। इसके ज़रिए भारत अफ़ग़ानिस्तान तक सड़क और रेल नेटवर्क विकसित कर चुका है, जिससे व्यापारिक और रणनीतिक पहुँच आसान हो गयी है। यह बन्दरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का हिस्सा है, जो भारत को रूस और यूरोप तक जोड़ता है। इस कॉरिडोर के माध्यम से भारत को पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और यूरोप तक वैकल्पिक मार्ग मिलता है, जो चीन के बेल्ट एण्ड रोड इनिशिएटिव का सन्तुलन बनाता है।
भारत ने चाबहार के विकास और सञ्चालन में लगभग 120 मिलियन डॉलर खर्च करने की प्रतिबद्धता जतायी है। भारत की कम्पनी India Ports Global Limited (IPGL) इस बन्दरगाह के एक हिस्से का सञ्चालन करती है। भारत ने ईरान के साथ मिलकर बन्दरगाह के बुनियादी ढांचे को विकसित किया है, जिसमें क्रेन, कंटेनर टर्मिनल और लॉजिस्टिक सुविधाएँ शामिल हैं। इसके अलावा, भारत ने चाबहार से अफ़ग़ानिस्तान तक सड़क और रेल नेटवर्क विकसित करने में भी सहयोग किया है। यह निवेश भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच को दर्शाता है।
अमेरिकी टैरिफ़ की घोषणा के बाद से यह अटकलें तेज़ हो गयीं हैं कि भारत चाबहार परियोजना से बाहर हो सकता है। यदि भारत पीछे हटता है तो मध्य एशिया तक पहुँच की उसकी रणनीति को बहुत बड़ा झटका लगेगा। चाबहार से भारत की दूरी का मतलब होगा कि भारत को फिर से पाकिस्तान के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँचने की कोशिश करनी पड़ेगी, जो सुरक्षा और कूटनीतिक दृष्टिकोण से जटिल है। इसके अलावा, चीन और पाकिस्तान के ग्वादर बन्दरगाह पर बढ़ते प्रभाव को देखते हुए भारत के लिए चाबहार का विकल्प खोना रणनीतिक रूप से अधिक नुकसानदायक हो सकता है।
इन अटकलों के बीच भारत सरकार ने बीते शुक्रवार को स्पष्ट किया कि चाबहार पोर्ट का सञ्चालन जारी रहेगा। सरकार ने कहा कि वह अमेरिका के साथ-साथ ईरान से भी सम्पर्क बनाये हुए है| ताकि परियोजना प्रभावित न हो। यह बयान भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय सन्तुलन बनाये रखने की कोशिश को दर्शाता है। भारत ने यह भी संकेत दिया है कि वह चाबहार को भू-राजनीतिक जीवनरेखा मानता है और इससे पीछे हटना कोई विकल्प नहीं है।
भारत के लिए चाबहार बन्दरगाह कई स्तरों पर अहम है। पहला, यह पाकिस्तान और चीन के बढ़ते प्रभाव को सन्तुलित करने का साधन है। दूसरा, यह अफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया के बाज़ारों तक सीधी पहुँच देता है, जिससे भारत को व्यापारिक लाभ मिलता है। तीसरा, यह ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान और मध्य एशिया से तेल-गैस आयात का वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है। चौथा, यह भारत-ईरान सम्बन्धों को मज़बूत करने का अवसर देता है, जो पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक उपस्थिति को सुदृढ़ करता है।
हालांकि, भारत को इस परियोजना में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। क्योंकि अमेरिकी प्रतिबन्ध और टैरिफ़ का दबाव लगातार बना रहता है। भारत को छूट (waiver) के लिए अमेरिका से बातचीत करनी पड़ती है, जो समय-समय पर बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण भारत को सन्तुलन साधना पड़ता है, जिससे उसकी रणनीतिक स्वतन्त्रता प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, निवेश और सञ्चालन पर अनिश्चितता बनी रहती है, जिससे परियोजना की गति प्रभावित होती है।
इन सबके बावजूद भारत ने चाबहार परियोजना को जारी रखने का निर्णय लिया है। यह निर्णय भारत की दीर्घकालिक रणनीतिक सोच और क्षेत्रीय सन्तुलन बनाये रखने की नीति को दर्शाता है। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह अमेरिका और ईरान दोनों के साथ संवाद बनाये रखेगा ताकि चाबहार परियोजना में किसी भी प्रकार की बाधा न आये। यह रुख भारत की विदेश नीति में आत्मनिर्भरता और बहुपक्षीय सन्तुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
निष्कर्षतः, चाबहार बन्दरगाह भारत के लिए सिर्फ़ व्यापारिक परियोजना नहीं बल्कि भू-राजनीतिक जीवनरेखा है। अमेरिकी दबाव और टैरिफ़ के बावजूद भारत ने साफ़ किया है कि वह इस परियोजना से पीछे नहीं हटेगा। आने वाले महीनों में भारत को अमेरिका और ईरान दोनों के साथ सन्तुलन साधते हुए चाबहार को अपनी रणनीतिक प्राथमिकताओं में बनाये रखना होगा। यह बन्दरगाह भारत की विदेश नीति, व्यापारिक विस्तार और क्षेत्रीय प्रभाव को सुदृढ़ करने का एक सशक्त माध्यम है, जिसे भारत किसी भी स्थिति में खोना नहीं चाहेगा।

(स्वतन्त्र टिप्पणीकार)





