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‘शिकस्त’—एक उपन्यास नहीं, एक वैचारिक यात्रा

किसी भी समाज की आत्मा उसके साहित्य में बसती है, और साहित्य की प्रामाणिकता उस संवेदना में, जो जीवन की टूटन-जुड़न से जन्म लेती है। उपन्यास ‘शिकस्त’ इसी परंपरा का एक सशक्त हस्ताक्षर है। यह केवल एक कथा नहीं, बल्कि समय, समाज और मनुष्य के अंतर्संघर्ष पर केंद्रित एक वैचारिक दस्तावेज़ है। जब हम ‘शिकस्त’ को पढ़ते हैं, तो यह प्रश्न स्वतः उभरता है—क्या शिकस्त वास्तव में पराजय है, या वह सृजन की पहली सीढ़ी? लेखक राजेश शर्मा का यह उपन्यास हमें इसी प्रश्न से रू-बरू कराता है।

शिकस्त: हार नहीं, आत्मबोध की प्रक्रिया

‘शिकस्त’ मानवीय संबंधों और भावनात्मक द्वंद्व का ऐसा आख्यान है, जिसमें प्रेम, घृणा, धैर्य, अपराधबोध और उम्मीद—सब एक साथ साँस लेते हैं। यह उपन्यास प्रेम को किसी आदर्शवादी आवरण में नहीं ढँकता, बल्कि उसे जीवन की कठोर सच्चाइयों के बीच रखकर परखता है। यहाँ मुहब्बत है, पर वह सहज नहीं; नफरत है, पर वह एकांगी नहीं; और सबसे महत्त्वपूर्ण—धैर्य है, जो परिस्थितियों से लड़ते हुए भी मनुष्य को मनुष्य बनाए रखता है।

अपराध जगत के रक्तरंजित परिदृश्य में बुनी गई यह कथा पाठक को रोमांचित ही नहीं करती, बल्कि उसे आत्मविश्लेषण के लिए विवश भी करती है। कहानी की शह-मात भरी गलियों में चलते हुए पाठक को यह अनुभव होता है कि शिकस्त किसी एक पात्र की नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझा पीड़ा है।

साहित्य और जीवन का द्वंद्वात्मक संबंध

राजेश शर्मा का लेखन जीवन से कटा हुआ नहीं है। राजनीति शास्त्र में स्नातकोत्तर शिक्षा, दशकों तक एक प्रशिक्षक के रूप में कार्य, रंगमंच और दूरदर्शन के अनुभव—इन सबका समेकित प्रभाव उनके साहित्य में स्पष्ट दिखाई देता है। यही कारण है कि ‘शिकस्त’ का कथ्य केवल भावनात्मक नहीं, सामाजिक भी है।उनका लेखन यह रेखांकित करता है कि मनुष्य जब बार-बार परिस्थितियों से पराजित होता है, तभी उसके भीतर सृजन की आकांक्षा जन्म लेती है। शिकस्त, दरअसल, उस क्षण का नाम है जब व्यक्ति बाहरी हार को स्वीकार कर भीतर की शक्ति को पहचानता है।

रंगमंच और कैमरे से उपजी दृष्टि

लेखक का रंगमंचीय और फिल्म निर्माण का अनुभव उपन्यास को एक दृश्यात्मक गहराई प्रदान करता है। नाटक ‘कोर्ट मार्शल’ में कैप्टन बिकास राय की भूमिका निभाने वाला यह रंगकर्मी जानता है कि संवाद केवल शब्द नहीं होते—वे मनोविज्ञान होते हैं। यही समझ ‘शिकस्त’ के संवादों और दृश्य विन्यास में परिलक्षित होती है।दूरदर्शन के लिए वृत्तचित्रों और टेलीफिल्मों का निर्माण, तथा तेलुगू धारावाहिक ‘भला रे विचित्रम’ जैसी परियोजनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि लेखक की दृष्टि क्षेत्रीय सीमाओं से परे है। यह बहुआयामी अनुभव ‘शिकस्त’ को एक व्यापक सामाजिक कैनवस देता है।

समाज का “आईना” बनता उपन्यास

 ‘शिकस्त’ समकालीन हिंदी उपन्यासों में इसलिए लोकप्रिय होता जा रहा हैं क्योंकि यह मनोरंजन और विचार दोनों के बीच संतुलन साधता है। यह पाठक को बाँधता भी है और प्रश्न भी देता है। उपन्यास यह स्पष्ट करता है कि जीत और हार व्यक्ति तय नहीं करता परिस्थितियाँ तय करती हैं; और इन्हीं परिस्थितियों में मनुष्य का चरित्र गढ़ा जाता है।

शिकस्त से सृजन: एक व्यापक संदेश

‘शिकस्त’ का सबसे बड़ा योगदान यही है कि यह पराजय को नकारात्मक नहीं, रचनात्मक प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करता है। यह उपन्यास बताता है कि हर टूटन के बाद एक नई संभावना जन्म लेती है। व्यक्ति जब अपने सबसे कमजोर क्षण में होता है, तभी वह अपने सबसे सशक्त रूप की ओर बढ़ता है।

राजेश शर्मा का सृजन हमें यह सिखाता है कि साहित्य केवल सौंदर्यबोध नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व भी है। ‘शिकस्त’ इसी उत्तरदायित्व का निर्वहन करता है संवेदना के साथ, साहस के साथ।मौजूदा परिवेश में ‘शिकस्त’ जैसे उपन्यास की चर्चा इसलिए आवश्यक है क्योंकि यह हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह उपन्यास कहता है शिकस्त अंतिम नहीं होती, वह सृजन का प्रवेश द्वार होती है। और जब साहित्य इस सत्य को उजागर करता है, तब वह केवल पुस्तक नहीं रहता—वह समय का साक्ष्य बन जाता है।

संजय वत्स

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