29 जून 1953 को उत्तर प्रदेश के बदायूं में जन्मे ताहिर फ़राज़ का बचपन से ही शायरी के प्रति गहरा लगाव था। उनके पिता उन्हें नशिस्तों में ले जाते थे, जहां वे अपनी ग़ज़लें तरन्नुम में सुनाया करते थे। मात्र 14 वर्ष की आयु में उन्होंने अपनी पहली मुकम्मल ग़ज़ल कही। इंटरमीडिएट की पढ़ाई के बाद वे अपने ननिहाल रामपुर आ गए और यहीं बस गए। रामपुर में उन्हें डॉ. शौक़ असरी और दिवाकर राही जैसे दिग्गजों का मार्गदर्शन मिला, जिसने उनके साहित्यिक जीवन को नई दिशा दी। फराज का रामपुर से गहरा नाता रहा है। उनका घर रामपुर में कोतवाली स्थित सर्राफा बाज़ार में है। वो अपनी मधुर आवाज़, कोमल भावों और सूफ़ियाना रंग से काव्य जगत में एक रौशन सितारे की तरह चमकते रहे। ताहिर फराज अपने परिवार के साथ मुंबई गए थे, जहां वे एक शादी में शामिल होने और अपनी बेटी के ऑपरेशन के लिए ठहरे हुए थे।
शनिवार सुबह उन्हें सीने में तेज दर्द हुआ, जिसके बाद उन्हें तुरंत अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन दुर्भाग्यवश तमाम चिकित्सा प्रयासों के बावजूद वे बच नहीं सके और अपने प्रियजनों को हमेशा के लिए शोक में छोड़ गए। ताहिर फराज ने बहुत कम उम्र में ही कविता लिखना शुरू कर दिया था और थोड़े ही समय में वे भारत के प्रमुख कवियों में से एक बन गए। सौलत पब्लिक लाइब्रेरी सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य काशिफ खां ने ताहिर फराज के निधन पर शोक जताते हुए बताया कि गजलें हों, भजन हों, नात हों, सलाम हों या मनकबत हों। उनकी विशिष्ट शैली, जोश और संगीतमयता ने हर वर्ग के श्रोताओं के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी।
गायन में उनका कोई सानी नहीं था और खानकाह नियाज़िया बरेली से उनके जुड़ाव ने उनकी कविताओं को आध्यात्मिक गहराई प्रदान की। समय बीतने के साथ-साथ, उन्हें भारत के प्रतिनिधि कवियों में से एक माना जाने लगा। ताहिर फराज का अंतिम संस्कार मुंबई में ही किए जाने की तैयारी हो रही है। उन्होंने बताया कि ताहिर फराज का निधन केवल एक व्यक्ति का अंत नहीं, बल्कि एक पूरे युग का, एक सांस्कृतिक आवाज़ का और उर्दू कविता के एक महत्वपूर्ण बाब का समापन हो गया है। उनके निधन से गजलें खामोश हो गई हैं और शब्द लावारिस हो गए हैं।
ताहिर फ़राज़ केवल शायर ही नहीं, बल्कि गीतकार और संगीतकार भी थे। उनकी ग़ज़लों में भावनाओं की गहराई और मधुर तरन्नुम की अद्भुत खूबी थी। उनकी मशहूर ग़ज़ल
काश ऐसा कोई मंज़र होता
मेरे कांधे पे तेरा सर होता
आज भी लोगों की ज़ुबान पर गूंजती है। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, यूएई, सऊदी अरब, पाकिस्तान और कुवैत जैसे देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनकी ग़ज़लों और एलबमों को टी-सीरीज सहित कई संगीत कंपनियों ने रिकॉर्ड किया, जो उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
चुनिंदा शेर
ताहिर फ़राज़ आज के ज़माने के मशहूर शायरों में से एक हैं। वह अक्सर तकन्नुम में नज़्में सुनाते हैं और उनकी ग़ज़लें सादा शब्दों का एक ख़ूबसूरत सा आसमान लगती हैं।
जब भी वो पाकीज़ा दामन आ जाएगा हाथ मिरे
आँखों का ये मेला पानी गंगा-जल हो जाएगा
वो सर भी काट देता तो होता न कुछ मलाल
अफ़्सोस ये है उस ने मिरी बात काट दी
वक़्त करता है ख़ुदकुशी मुझ में
लम्हा लम्हा है ज़िंदगी मुझ में
चंद लम्हात की ख़ुशी के लिए
लोग बरसों उदास रहते हैं
दर्द ख़ामोश रहा टूटती आवाज़ रही
मेरी हर शाम तिरी याद की हमराज़ रही
तिरे हुस्न तेरे जमाल का मैं दिवाना यूँ ही नहीं हुआ
है मुझे ख़बर तिरे रूप में ये छुपा हुआ कोई और है
सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को
फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी
वक़्त करता है ख़ुदकुशी मुझ में
लम्हा लम्हा है ज़िंदगी मुझ में
सर-फिरा झोंका हवा का तोड़ देगा शाख़ को
फूल बनने की तमन्ना में कली रह जाएगी
ग़म इस का कुछ नहीं है कि मैं काम आ गया
ग़म ये है क़ातिलों में तिरा नाम आ गया
मैं उस के साए में यूँ तो ठहर नहीं सकता
उदास पेड़ का पत्ता हिले तो रुक जाऊँ
तमाम दिन के दुखों का हिसाब करना है
मैं चाहता हूँ कोई मेरे आस-पास न हो
सिलसिला फिर से जुड़ा है तो जुड़ा रहने दे
दिल के रिश्तों को तमाशा न बना यार मिरे
दोस्तों की महफ़िलों से दूर हम होते गए
जैसे जैसे सिलवटें पड़ती गईं पोशाक पर
अब के बरस होंटों से मेरे तिश्ना-लबी भी ख़त्म हुई।
तुझ से मिलने की ऐ दरिया मजबूरी भी ख़त्म हुई।
↪ हमीद कानपुरी (अब्दुल हमीद इदरीसी), मीरपुर, कैन्ट, कानपुर



