शिक्षा सदन इंटर कॉलेज मेहवडकलां,रुड़की जनपद-हरिद्वार की प्रख्यात हिन्दी शिक्षिका एवं साहित्य साधिका डॉ. मेनका त्रिपाठी की कृति “तितली के पंखों पर” समकालीन हिन्दी यात्रा-साहित्य में एक विशिष्ट और संवेदनात्मक हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठित होती है। यह पुस्तक मात्र यात्राओं का विवरण नहीं, बल्कि आत्मा के अंतरंग प्रदेशों की तीर्थयात्रा है—जहाँ शब्द साधना बन जाते हैं और अनुभव दर्शन।
शीर्षक और आवरण : प्रतीक का सौंदर्य
पुस्तक का शीर्षक अपने आप में एक गहन प्रतीक है। तितली—नाजुक, रंगीन, परंतु संघर्षशील। उसके पंखों पर उड़ान की आकांक्षा है, किंतु वही पंख समाज की रूढ़ियों से बार-बार छिन्न-भिन्न होते हैं। आवरण पर चंद्रमा की शीतल आभा में उन्मुक्त उड़ती तितली मानो स्त्री-मन की उस मौन आकांक्षा का दृश्यात्मक रूप है, जो अंधकार को चीरकर प्रकाश की ओर बढ़ना चाहती है।
समर्पण और आरंभ : विनम्रता की दीप्ति
लेखिका कहती हैं,
“इस पुस्तक में जो कुछ भी है, वह मेरा होकर भी मेरा नहीं।”
—यह कथन उनके आत्मबोध की विनम्रता को रेखांकित करता है। यह स्वीकारोक्ति बताती है कि उनके अनुभव व्यक्तिगत होकर भी सामूहिक हैं। यह पुस्तक उन असंख्य स्त्रियों को समर्पित है, जिन्होंने मौन में तपकर जीवन को अर्थ दिया।
चंद्रशिला : प्रतीकात्मक शिखर
प्रथम संस्मरण विश्व के उच्चतम शिव मंदिर चंद्रशिला की यात्रा पर आधारित है। यहाँ लेखिका का यह कथन—
“हर किसी के जीवन में एक चंद्रशिला होती है जहाँ उसे पहुँचना है, पर समाज और परंपराएँ उसके पंख काटती रहती हैं। तब वह तितली नहीं, चींटी बनकर चढ़ती है।”
—पूरी पुस्तक का दार्शनिक केंद्र बन जाता है।
इस संस्मरण में तीन पीढ़ियों की स्त्रियाँ एक साथ उपस्थित हैं—
- दादी की सीमित परिधि,
- माँ की आधी खुली खिड़की,
- और लेखिका की शिखर तक पहुँचने की जिजीविषा।
यह आरोहण केवल पर्वत का नहीं, मानसिक और सामाजिक अवरोधों का भी है।
यात्रा का आध्यात्मिक विस्तार!
डॉ. त्रिपाठी की दृष्टि में यात्रा केवल स्थान-परिवर्तन नहीं, बल्कि आत्म-परिवर्तन है। गंगा और शिव उनके लेखन में आस्था के प्रतीक मात्र नहीं, जीवन-दर्शन के अवलंब हैं। वे लिखती हैं—
“यह यात्रा केवल चलना नहीं है, यह ठहरना है, देखना है, और अंत में समर्पण करना है—यही गंगा बन जाना है।”
विदेश यात्राओं का वर्णन पुस्तक को वैश्विक संदर्भ प्रदान करता है—
- मॉरिशस में समुद्र-परिक्रमा के माध्यम से वे भारतीय सांस्कृतिक चेतना को विश्व-पटल पर अनुभव करती हैं।
- फ़िज़ी में शिवरात्रि पर गंगाजल अर्पित करते हुए वे प्रवासी भारतीयों की सांस्कृतिक निष्ठा का भावपूर्ण चित्र अंकित करती हैं।
- श्रीलंका में सीता की करुणा और रावण की विद्वत्ता के बीच वे स्त्री-मन के द्वंद्व को सूक्ष्मता से स्पर्श करती हैं।
- कज़ाकिस्तान की हिमभूमि में उन्हें शिव का मौन और तप का स्वर सुनाई देता है—
“वहाँ की बर्फ़ में मुझे शिव की साँसें सुनाई दीं। हिम ही उनका स्वरूप है।”
इन यात्राओं में संस्कृति, अध्यात्म और स्त्री-अस्मिता का त्रिवेणी-संगम है।
भाषा शिल्प और संवेदना
डॉ. मेनका त्रिपाठी की भाषा में काव्यमयी लय है। उनके वाक्य चित्र रचते हैं, और चित्र विचारों को जन्म देते हैं। अलंकारों की सुषमा नियंत्रित है, अतिशयोक्ति से दूर। वर्णन में प्रवाह है, किंतु विश्लेषण में गंभीरता।
लेखिका की शैली संस्मरणात्मक होते हुए भी दार्शनिक है। पाठक को वे केवल दृश्य नहीं दिखातीं, बल्कि दृश्य के पीछे का अर्थ भी उद्घाटित करती हैं।
स्त्री-विमर्श का सूक्ष्म स्वर
यह पुस्तक घोषणात्मक स्त्री-विमर्श नहीं करती, बल्कि अनुभवजन्य स्त्री-चेतना को उभारती है। यहाँ प्रतिरोध शोर नहीं, साधना है; संघर्ष आक्रोश नहीं, आत्मबल है। तितली के पंखों की कोमलता में ही उसकी शक्ति निहित है।
चित्रात्मकता और सौंदर्य
पुस्तक के अंतिम भाग में संलग्न चित्र संस्मरणों को दृश्यात्मक आयाम प्रदान करते हैं। शब्द और चित्र का यह समन्वय पाठक को यात्रा का सहभागी बना देता है।
समग्र मूल्यांकन
“तितली के पंखों पर” हिन्दी यात्रा-साहित्य की परंपरा में एक संवेदनशील और विशिष्ट जोड़ है। यह पुस्तक पाठक को केवल स्थानों की यात्रा नहीं कराती, बल्कि आत्मा की गहराइयों तक ले जाती है। इसमें आस्था है, संस्कृति है, स्त्री-शक्ति का मौन उद्घोष है और जीवन को देखने की एक सम्यक दृष्टि है।
डॉ. मेनका त्रिपाठी की यह कृति साहित्य-जगत में उनकी सशक्त उपस्थिति को प्रमाणित करती है। यह पुस्तक शिक्षकों, शोधार्थियों, साहित्य-प्रेमियों और विशेषतः स्त्री-अनुभूति को समझने वाले पाठकों के लिए संग्रहणीय है।
अंततः कहा जा सकता है कि यह कृति पाठक को उसकी अपनी “चंद्रशिला” की ओर बढ़ने का साहस देती है—
तितली के पंखों पर बैठकर भी ऊँचाइयों को छू लेने का आत्मविश्वास।
— संजय वत्स
साहित्य समीक्षक,शिक्षक (रुड़की)




