खामोशी में दबा सम्मान

आकाश और विमल बैठे बातें कर रहे थे कि माला आकर वहाँ बैठ जाती है और विमल से बातचीत करने लगती है कि तभी आकाश उसे टोक देता है।
आकाश:- “अगर तुम्हें पूरी जानकारी नहीं है तो बीच में मत बोलो और इन्हें क्या बता रही हो तुम? यह भी न्यूज़ देखते हैं उन्हें पता है सब!”
विमल:-” अरे नहीं यार! भाभी तो बस अपनी जानकारी शेयर कर रही थी मुसझे!”
आकाश:-” कॉफी के लिए कहा था तुम्हें? अभी तक बनाई नहीं?”
माला:-” मैं.. बस अभी ला रही हूं और वह अंदर चली जाती है। थोड़ी देर में माला काफी रखकर अंदर चली जाती है।
आकाश:-“ये चीन ने नई टेकनीक की कार बना कर दुनिया में तहलका मचा दिया है।”
विमल:-“हां…. एक नई शक्ति के रूप में उभर रहा है यह देश। ज्यादा ताकत बढ़ जाने पर खतरा भी ज्यादा रहता है।”
आकाश:-” हां… यह तो है, खैर…. और सुनाओ काफी समय बाद तुम्हें समय मिला मुझसे मिलने का? इतने दिनों तक कहां बिजी थे?”
विमल:-“अरे कुछ नहीं, बस रेखा का कॉलेज का काम जरा ज्यादा हो गया था, उसे ही मदद करने में व्यस्त रहा। अब बच्चों की पढ़ाई की वजह से उसे कुछ नहीं बोलता हूँ तो जितना हो सकता मैं उसका हाथ बंटा देता हूं ऑफिस से आकर। बस इसीलिए समय नहीं निकल पा रहा था तुमसे मिलने का… तुम ही आ जाते यार घर पर मिलने भाभी के साथ… रेखा भी मिल लेती तुम दोनों से।”
आकाश:-“15 दिन से तो मैं बाहर ही था। स्क्रैप का माल देख रहा था, पार्टी से डील होने में समय लग रहा था तो आने में लेट हो गया… आऊंगा किसी दिन और रेखा तो टीचर है दोपहर के बाद तो घर पर होती है फिर बाद में तो घर संभाल लेती है तुम्हारी मदद की क्या जरूरत पड़ जाती है उसे?”
विमल (हंसते हुए):- “अरे नहीं! वह तो सब कर लेती है लेकिन एग्जाम के पेपर बनाने में, फिर बाद में पेपर चेक करने के लिए काम आ जाते हैं तो उसका काम बढ़ जाता है तो मैं उसकी थोड़ी हेल्प कर देता हूं। अच्छा! चलो चलता हूं, आओ कभी घर पर सब मिलकर मजे करेंगे।”
आकाश:- “जरूर!”
विमल चला जाता है। माला आकर काफी के मग उठाने लगती है
आकाश:- “तुम्हें क्या जरूरत थी विमल के सामने ज्यादा बोलने की?”
माला:- “लेकिन मैंने कुछ गलत नहीं कहा था मैंने जो न्यूज़ में देखा वही उनके साथ शेयर कर रही थी और उन्हें भी तो पता ही है ना?”
आकाश:- “ज्यादा पढ़ी-लिखी होने का मतलब यह तो नहीं है कि जो तुमको सही लगे वही बोलो, सबके सामने ओवर स्मार्ट मत बना करो।”
माला कुछ बोली नहीं वह आकाश के इस स्वभाव की आदी हो चुकी थी। वह अपने काम में लग गई। विमल अपने घर पहुंचा ही था कि उसकी पत्नी रेखा उसका इंतजार कर रही थी। उसे देखते ही बोली, “अरे आ गए तुम! मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी, चलो साथ में चाय पीते हैं।”
विमल:- “नहीं! मैं नहीं पियूंगा…मैं आकाश के घर से काफी पी कर आया हूं। बहुत दिन हो गए थे उससे मिले हुए तो उसके पास चला गया था। वह तुम्हें याद कर रहा था।”
रेखा:- “तो अगले संडे दोपहर को खाने पर बुला लो एक गेट टू गेदर हो जाएगा।”
विमल:- “हां… बुला लेता हूं।”
इधर आकाश माला को फिर से उलाहने दे रहा था। उसकी पड़ोस की सहेली आई हुई थी उसके पास.. पड़ोसन:- “अरे भाभी जी, जरा सोनू को मैथ्स के कुछ सवाल समझ में नहीं आ रहे हैं और उसकी ट्यूशन टीचर बाहर गई हुई है तो आप समझा दो प्लीज।”
माला:- “क्यों नहीं! शाम को भेज दीजिएगा आप।”
आकाश:- “अरे भाभी जी! रेखा को तो पढ़ाई वगैरह छोड़े हुये कितने साल हो गए हैं, बच्चे भी अब कॉलेज में है और आजकल स्कूल के सिलेबस हर साल बदल जाते हैं। इससे कहां हो पाएगा।” माला:-  “भाभी! आप भेज देना, मैं देख लूंगी।”
पड़ोसन:- “जी ठीक है।”
आकाश:- “तुम भी अपने ऊपर सरदर्द ले लेती हो। क्या जरूरत थी उसे यहां बुलाने की और नहीं समझा पाई तो? पहले जैसी पढ़ाई नहीं आजकल?”
माला कुछ बोलती नहीं वह अंदर चली जाती है।  शाम को सोनू उसके पास आता है और आधा घंटा बैठकर मैथ्स के सवाल समझ कर घर जाने लगता है।
माला:- “जब भी दिक्कत हो आ जाना मैं समझा दूंगी।”
सोनू:- “जी आंटी! थैंक यू..!”
माला मुस्कुराती है।
आकाश:- “विमल का फोन आया था। संडे को उसने अपने घर खाने पर बुलाया है, चलेंगे हम।”
माला:- “ठीक है।”
संडे को माला विमल और रेखा से मिलने उनके घर जाने के लिए तैयार होती है। उसने वहां के लिए स्वीट डिश सेवई की खीर बना ली थी। दोनों विमल के घर पहुंचे तो उन दोनों ने बहुत गर्मजोशी से उनका स्वागत किया।
रेखा:- “माला तुम कितने दिनों बाद मिली हो मुसझे।”
माला:- “हां, समय ही नहीं मिल पाता है और तुम भी बहुत व्यस्त रहती हो। कभी समय निकालकर तुम ही आ जाया करो मेरे पास।”
रेखा:- “हां यार… बिल्कुल आऊंगी।” तुम बाहर बैठो…मैं काफी लेकर आती हूं।”
माला:- “अरे इस समय काफी! मतलब 12:00 बज रहे हैं तो सीधे खाना ही खायेंगे और यह सामान फ्रिज में रख दो।”
रेखा:- “क्या है इसमें?”
माला:- “अरे कुछ नहीं बस जल्दी-जल्दी में सेवई की खीर बना ली तुम दोनों के लिए।”
रेखा:- “अरे तुमने क्यों तकलीफ की?” तभी विमल बोल पड़ता है….।
विमल:- “रेखा तुम मत खाना लेकिन मैं तो खाऊंगा। मुझे तो बहुत पसंद है… थैंक यू भाभी।”
आकाश:- “हां भई लो तुम्हारी पाककला की भी तारीफ हो गई और हां मैं तो कॉफी पी लूंगा।”
माला मुस्कुरा देती है।
रेखा(माला से):- “आकाश भाई साहब कुछ ज्यादा ही मस्ती करते रहते हैं।”
माला:- “उनका स्वभाव ही ऐसा है। अब बुरा नहीं मानती मैं और बुरा मान कर ही क्या कर लूंगी मैं? वो कहते हैं ना कि एक स्त्री घर को स्वर्ग और नरक दोनों बना सकती है। ठीक उसी तरह पुरुष भी एक स्त्री  की गरिमा को समाज में बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है। जब तक वह सबके सामने अपनी पत्नी से इज्जत से पेश नहीं आएगा तब तक दूसरे लोग भी उस स्त्री को महत्व नहीं देंगे या बेचारगी भरी नजरों से देखेंगे। विमल भाईसाहब तुम्हारे हर काम में मदद करते हैं। तुम्हारी परेशानियों को समझते हैं और उसी के अनुरूप तुमसे व्यवहार करते हैं। ये बड़ी बात है।”
रेखा:- “सही कह रही हो…।”
माला:-” कभी तुमने सोचा है, इस बात पर गौर किया है क्या कि कहने को तो सब कुछ हमारा है लेकिन एक 500 रूपये भी खर्च करने की आजादी नहीं होती है अपने मन से। हर खर्च का हिसाब देना पड़ता है। आत्मनिर्भर औरत को भी यह नहीं पता होता है कि उसकी कमाया हुआ पैसा कहां इन्वेस्ट किया जाना चाहिए? यह भी उसका पति या घर के बड़े लोग ही तय करते हैं। आश्चर्य होता है कि जो औरत इतनी पढ़ी लिखी है इतना ऑफिस – घर बाहर सब मैनेज करती है उसे यह जानकारी नहीं होती कि उसे अपने पैसे को कहां इन्वेस्ट करना चाहिए? और सारा हिसाब किताब भी उसका पति ही देखता है।
माला:- “कभी-कभी बुरा भी लगता है लेकिन तुमने  कहा इसलिए मैंने यह बात कही। खैर स्वभाव तो बदल नहीं सकते किसी का भी।”
तभी विमल काफी लेकर बाहर चला आता है और रेखा को बोलता है कि खाने के समय आवाज दे देना तो मदद के लिए आ जाऊंगा। माला मुस्कुराती हुई आकाश को देखती है।
प्रियंका वरमा माहेश्वरी, गुजरात

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top