दिल वालों की दिल्ली

पिछले 11 सालों से दिल्ली जहरीली हवा में सांस ले रही है कुछ समय तक पराली जलाने को दोष दिया जाता रहा लेकिन बाकी कारणों को नजरअंदाज किया गया नतीजा दिल्ली के लोग भुगत रहे हैं। माना जा रहा है कि दिल्ली में प्रदूषण की वजह से एक व्यक्ति की औसत आयु 8.2 वर्ष तक कम हो सकती है। यह एक गंभीर चेतावनी है जिंदगी के प्रति, स्वास्थ्य के प्रति। दिल्ली में एक्यूआई 500 के ऊपर पार कर गया है यह आधिकारिक इंडेक्स की अधिकतम सीमा से ज्यादा है। सिर्फ पराली जलाने को ही कारण मानकर इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता है। बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियां उनके चिमनियों से निकलता हुआ धुआं, गाड़ियों से निकलता हुआ धुआं, सड़कों की धूल, कंस्ट्रक्शन सभी हवा को दूषित करने वाले कारक हैं।
बढ़ते प्रदूषण से जहरीली हवा के कारण दिल्ली सरकार ने आपातकालीन कदम उठाते हुए पचास फीसदी लोगों को घर से काम करना अनिवार्य कर दिया है। निर्माण तोड़फोड़ जैसे कार्यों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। स्वास्थ्य के नजरिये से देखे तो सबसे ज्यादा जहरीली हवा का असर फेफड़ों पर और सांस से संबंधित होता है यदि सावधानी ना बरती गई तो परिणाम गंभीर हो सकते हैं। सरकार ने दीर्घकालिक योजना की बात कही है लेकिन इसकी शुरुआत कहीं से होती नजर नहीं आ रही है। प्रदूषण खत्म हो इसके लिए जल्दी सुधार की ओर कदम उठाए जाने चाहिए ताकि आम जन का जीवन सही हो सके। राजनीतिक दोषारोपण करने के बजाय कारणों पर अध्ययन करके उपाय निकाले जाने चाहिए ताकि स्थिति पर नियंत्रण पाया जा सके।
विदेशों में भी भारत को सबसे गंदा देश कहा गया है। क्या यही छवि हम प्रस्तुत करेंगे दुनिया के सामने.. जहां ये नारा दिया जाता है “ना गंदगी करेंगे और ना करने देंगे”। तंदूर को बंद करने की बेतुकी बात के बजाय कार्यकारिणी प्रणाली में बदलाव की बात की जानी चाहिए। इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन शुरू हो गया है तो उनके उपयोग पर जोर दिया जाना चाहिए। सोलर एनर्जी के फायदे बताये जाने चाहिए और उसका ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल किया जाने पर जोर दिया जाना चाहिए। निजी वाहनों के बजाय सार्वजनिक वाहनों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाना चाहिए । कूड़ा जलाने से बचना चाहिए। धूल मिट्टी वाले निर्माण कार्य बंद किये जाने चाहिए। 11 साल से जमा प्रदूषण इतना करने पर भी धीरे-धीरे ही समाप्त हो पाएगा। साथ ही नागरिकों को भी जागरूक होकर सहयोग करना चाहिए। तभी वहाँ के लोग अपना जीवन बचा सकते हैं।
– प्रियंका वरमा माहेश्वरी, गुजरात

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