लघुकथा : हौसलों की उड़ान

दिसंबर माह का अंतिम सप्ताह चल रहा था। ठंडी हवा के झोंके मैदान में फैले घास के तिनकों को सहला रहे थे और ऊपर आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें लहरों की तरह डोल रही थीं। कहीं नीली, कहीं लाल, कहीं पीली-मानो आसमान ने अपने लिए उत्सव का परिधान पहन लिया हो। सूरज अपनी व्हीलचेयर पर बैठा, गर्दन उठाए उसी आसमान को एकटक देख रहा था। उसकी आँखों में चमक थी-ऐसी चमक जो केवल सपनों में होती है। आखिर हो भी क्यों न! अगले पंद्रह दिनों बाद शहर में भव्य पतंग मेला लगने वाला था। हर साल की तरह इस बार भी जो सबसे अच्छी पतंगबाज़ी दिखाएगा, उसे “पतंग बाज सम्मान” से नवाज़ा जाएगा। इस खिताब की चाह में लोग एक महीना पहले से ही गांव के बाहर बने बड़े मैदान में अभ्यास करने जुट गए थे। कोई छोटी पतंगों से कटी लड़ाई की कला निखार रहा था, तो कोई विशाल पतंगों के साथ ऊँची उड़ान का अभ्यास कर रहा था। रंग, आकार और कौशल-सबका संगम उस मैदान में दिख रहा था। सूरज भी कभी इसी मैदान का हिस्सा हुआ करता था। उसे पतंग उड़ाने का ऐसा शौक था कि सुबह से शाम तक उसकी उँगलियों में डोर की सरसराहट रहती। हवा की चाल पहचानना, पतंग को झटका देना, डोर ढील-तनी का संतुलन—ये सब उसे जैसे जन्मजात आता था। लोग कहते, इस लड़के में जादू है। सूरज हँसकर कहता, जादू नहीं, मेहनत।
लेकिन एक साल पहले, इसी उत्साह के बीच एक हादसा हुआ। अभ्यास करते समय अचानक उसका पैर एक गड्ढे में फिसल गया। गिरावट ऐसी थी कि पैर की अंदरूनी नसे बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गई। इलाज हुआ, महीनों तक दर्द और इंतज़ार चला, पर अंत में सच सामने था; वह अब चलने लायक नहीं बचा। पैरों से अपाहिज हो गया और व्हीलचेयर उसकी साथी बन गई। शुरुआती दिनों में सूरज टूट सा गया। जिस मैदान में उसकी हँसी गूँजती थी, वहीं से वह दूर हो गया। खिड़की से पतंगें देखता और मन ही मन आँसू पी जाता। लोग सहानुभूति जताते, पर उनके शब्द भी कभी-कभी बोझ बन जाते। अब आराम करो, अब यह सब छोड़ दो, ऐसी बातें उसे भीतर तक चुभती थीं। लेकिन समय के साथ सूरज ने समझा कि जीवन का अर्थ केवल चलना नहीं, आगे बढ़ना है। और आगे बढ़ने के लिए हौसले चाहिए-पैर नहीं। उसने अपने कमरे में बैठकर पतंगों के डिज़ाइन बनाना शुरू किया। अलग-अलग आकार, हल्के ढांचे, मजबूत डोर-उसका दिमाग हर दिन उड़ान भरता। वह इंटरनेट पर पतंगबाज़ी के वीडियो देखता, हवा के पैटर्न समझता और नोट्स बनाता। धीरे-धीरे उसकी आँखों में फिर वही चमक लौट आई।
एक दिन उसने अपने दोस्त मोहन को बुलाया। मोहन उसके साथ ही पतंग उड़ाता था। सूरज ने कहा, मैं मैदान में आना चाहता हूँ। मोहन चौंका, लेकिन…? सूरज मुस्कराया, मैं पतंग उड़ाऊँगा-अपने तरीके से। मोहन ने गांव के बच्चों और युवाओं से बात की। अगले दिन मैदान में एक अलग ही दृश्य था। सूरज व्हीलचेयर पर बैठा, उसके सामने एक छोटा स्टैंड लगा था जिसमें पतंग और डोर व्यवस्थित रखी थीं। मोहन और दो बच्चे उसकी मदद के लिए थे। सूरज निर्देश देता-अब ढील दो… हवा बाईं ओर है… अब खींचो! पतंग ऊपर उठती और आसमान में थिरकने लगती। कुछ ही दिनों में लोग समझ गए कि सूरज केवल पतंग नहीं उड़ाता, वह हवा से संवाद करता है। धीरे-धीरे सूरज की टीम बनने लगी। वह बच्चों को सिखाने लगा-धैर्य, सहयोग और सुरक्षा। वह कहता, पतंगबाज़ी जीतने की नहीं, समझने की कला है। उसने कटी डोर से पक्षियों को बचाने के तरीके बताए, सुरक्षित धागों का इस्तेमाल सिखाया और साफ मैदान की अहमियत समझाई। लोग सुनते, सीखते और मानते भी थे।
पतंग मेले का दिन आ पहुँचा। शहर रंगों से सजा था। ढोल-नगाड़े, बच्चों की हँसी, और ऊपर-आसमान में सैकड़ों पतंगें। प्रतियोगिता शुरू हुई। बड़े-बड़े नाम मैदान में थे। सूरज अपनी टीम के साथ एक कोने में शांत बैठा था। उसकी पतंग खास थी- हल्की, संतुलित और रंगों में संदेश लिखे थे; हौसला, सहयोग, सुरक्षा। जब उसकी बारी आई, सूरज ने गहरी साँस ली। उसने संकेत दिया। पतंग हवा में उठी, धीरे-धीरे ऊँचाई पकड़ी और फिर ऐसी स्थिर उड़ान भरने लगी कि सबकी निगाहें ठहर गईं। न कोई जल्दबाज़ी, न दिखावा-बस सधा हुआ कौशल। हवा तेज़ हुई, पतंग झुकी, लेकिन सूरज के निर्देशों ने उसे संभाल लिया। लोग तालियाँ बजाने लगे। निर्णायक मंडल ने केवल उड़ान नहीं, संदेश भी देखा। अंत में घोषणा हुई- इस वर्ष का पतंग बाज सम्मान… सूरज और उसकी टीम को! मैदान तालियों से गूँज उठा। सूरज की आँखें नम थीं, पर चेहरे पर मुस्कान थी-जीत की, और अपने आप पर विश्वास की।
सम्मान लेते हुए सूरज ने कहा, आज मैंने सीखा है कि असली उड़ान पैरों से नहीं, हौसलों से होती है। जब हम एक-दूसरे का हाथ थामते हैं, तब कोई भी आसमान दूर नहीं रहता। उस दिन के बाद सूरज ने बच्चों के लिए एक प्रशिक्षण केंद्र शुरू किया। वहाँ पतंगबाज़ी के साथ जीवन के सबक सिखाए जाते-धैर्य, अनुशासन, पर्यावरण की जिम्मेदारी और टीमवर्क। गांव और शहर के लोग वहाँ आने लगे। सूरज की कहानी हौसलों की मिसाल बन गई। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हर साल दिसंबर में जब आसमान रंगों से भरता, सूरज व्हीलचेयर पर बैठा मुस्कराता- क्योंकि उसने जान लिया था कि सीमाएँ शरीर की हो सकती हैं, सपनों की नहीं। संदेश यही है: परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, यदि नीयत मजबूत हो, सहयोग मिले और सीखने का जज़्बा जिंदा रहे, तो हर कोई अपनी पतंग आसमान तक पहुँचा सकता है।
लेखक : श्याम कोलारे
(सामाजिक कार्यकर्ता)
छिन्दवाड़ा, मध्यप्रदेश

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top