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एम्स रायबरेली ने चार महीने की बच्ची को दिया जीवनदान

➯ दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी का सफल इलाज

रायबरेली। खीरो क्षेत्र की रहने वाली चार महीने की एक बच्ची को तीन महीने पहले सांस लेने में तकलीफ के चलते एम्स रायबरेली के आपातकालीन विभाग में लाया गया था। निमोनिया की आशंका के आधार पर बच्ची को एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नमिता मिश्रा के मार्गदर्शन में पीआईसीयू में भर्ती किया गया और वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया।

उपचार के दौरान डॉक्टरों ने बच्ची के हाथ-पैरों में कमजोरी पाई। जांच के दौरान यह भी सामने आया कि बच्ची की बड़ी बहन की तीन महीने की उम्र में इसी तरह की शिकायतों के कारण मृत्यु हो चुकी थी, क्योंकि उस समय सही समय पर निदान और इलाज नहीं हो सका था।

आनुवंशिक जांच के बाद बच्ची में स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (SMA) नामक गंभीर आनुवंशिक बीमारी का पता चला। यह रोग उन नसों को प्रभावित करता है जो मांसपेशियों को नियंत्रित करती हैं, जिससे धीरे-धीरे मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं। गंभीर मामलों में रोगी को सांस लेने और निगलने में भी कठिनाई होती है।

इस बीमारी का इलाज अत्यंत महंगा माना जाता है, लेकिन हाल के वर्षों में विकसित दवा रिसडिप्लाम अपेक्षाकृत सस्ती है और शोध के अंतर्गत उपयोग में लाई जा रही है। एम्स रायबरेली की टीम ने लखनऊ से यह दवा मंगवाकर बच्ची को दी, जिससे उसकी स्थिति में उल्लेखनीय सुधार देखा गया।

करीब पांच सप्ताह तक बच्ची को वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। इसके बाद धीरे-धीरे उसे ऑक्सीजन सपोर्ट पर लाया गया और अब बच्ची बिना किसी सहारे के सामान्य हवा में सांस ले रही है। डॉ. राजकुमार, सहायक प्रोफेसर ने बच्ची के उपचार और स्वस्थ होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जबकि बाल रोग विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मृत्युंजय कुमार ने संपूर्ण प्रबंधन में अहम योगदान दिया।

कार्यकारी निदेशक डॉ. अमिता जैन के नेतृत्व में एम्स रायबरेली लगातार स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है। इस सफलता पर अपर चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नीरज कुमार श्रीवास्तव ने बाल रोग विभाग की पूरी टीम को बधाई दी।

तीन महीने तक अस्पताल में इलाज के बाद अब बच्ची को स्वस्थ अवस्था में डिस्चार्ज किया जा रहा है, जो एम्स रायबरेली के लिए एक बड़ी चिकित्सकीय उपलब्धि मानी जा रही है।

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