हाथरस। जनपद में पर्यावरण संरक्षण के दावे भले ही कागजों में हरे-भरे नजर आते हों, लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत दिखाई दे रही है। हरे-भरे पेड़ों पर धड़ल्ले से कुल्हाड़ी चलाई जा रही है, जबकि जिम्मेदार विभाग कुंभकरणीय नींद में सोया प्रतीत होता है। फाइलों में वृक्षारोपण, निरीक्षण और कार्रवाई की लंबी-चौड़ी रिपोर्टें तैयार हो रही हैं, लेकिन धरातल पर हरियाली तेजी से सिमटती जा रही है।
सूत्रों के अनुसार प्रतिदिन सैकड़ों से लेकर लगभग एक हजार तक पेड़ों का दोहन किया जा रहा है। बागों के ठेके लेकर रातों-रात पेड़ों की कटाई की जा रही है और लकड़ी की खेप खुलेआम बाहर भेजी जा रही है। हैरानी की बात यह है कि जिन मार्गों से ट्रैक्टर-ट्रॉली और ट्रक गुजरते हैं, वहां प्रशासन की नजर कैसे नहीं पड़ती? या फिर सबकुछ देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है?
जनपद में टीटीजेड के नाम पर उद्योगों पर सख्ती दिखाने वाले अधिकारी अवैध कटान के मामलों में चुप्पी साधे हुए हैं। सवाल उठ रहा है कि क्या कार्रवाई केवल छोटे कारोबारियों तक ही सीमित है? पर्यावरण संरक्षण के नाम पर बैठकों और निर्देशों की भरमार है, लेकिन उनके पालन की स्थिति स्पष्ट नहीं है।
कुछ लोगों का आरोप है कि इस पूरे खेल में मोटी कमाई का हिस्सा तय होने के कारण शिकायतें भी फाइलों में दबकर रह जाती हैं। पूर्व में एक पर्यावरणविद के आंदोलन के दौरान कुछ समय के लिए कटान की रफ्तार थमी थी, लेकिन अब स्थिति फिर पहले जैसी होती दिख रही है। यदि जिम्मेदार विभाग इसी तरह कागजी खानापूर्ति तक सीमित रहे, तो आने वाले समय में हाथरस की हरियाली केवल इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी।





