रायबरेली। प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग द्वारा 18 मार्च को “गर्भावस्था में उच्च रक्त शर्करा” (Hyperglycemia in Pregnancy) विषय पर सतत चिकित्सा शिक्षा (CME) कार्यक्रम का सफल आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य फैकल्टी सदस्यों और रेजिडेंट डॉक्टरों को गर्भावस्था के दौरान हाइपरग्लाइसेमिया के निदान एवं प्रबंधन से जुड़ी नवीनतम जानकारियों से अवगत कराना था। यह विषय वर्तमान समय में मातृ स्वास्थ्य के क्षेत्र में तेजी से उभरती चिंता के रूप में देखा जा रहा है। कार्यक्रम की शुरुआत पारंपरिक दीप प्रज्वलन के साथ हुई। इस अवसर पर कार्यकारी निदेशक प्रो. अमिता जैन ने गर्भावस्था में बढ़ते हाइपरग्लाइसेमिया के मामलों पर चिंता व्यक्त की और कहा कि ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रम स्वास्थ्य कर्मियों के ज्ञान और कौशल को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
कार्यक्रम में डीन अकादमिक प्रो. नीरज कुमारी, डीन अनुसंधान प्रो. अर्चना वर्मा, डीन परीक्षा प्रो. प्रगति गर्ग तथा अपर चिकित्सा अधीक्षक डॉ. नीरज कुमार श्रीवास्तव की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा को बढ़ाया। CME की शुरुआत विभागाध्यक्ष डॉ. वंदना वर्मा के स्वागत भाषण से हुई। उन्होंने इस प्रकार के शैक्षणिक आयोजनों की आवश्यकता पर जोर देते हुए कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की।
वैज्ञानिक सत्रों के अंतर्गत विशेषज्ञों ने महत्वपूर्ण व्याख्यान दिए। लखनऊ स्थित अपोलो मेडिक्स की निदेशक प्रो. (डॉ.) विनीता दास ने जेस्टेशनल डायबिटीज मेलिटस के प्रबंधन पर विस्तृत जानकारी दी, जिसमें आहार और औषधीय दोनों पहलुओं को शामिल किया गया। वहीं KGMU, लखनऊ से प्रो. स्मृति अग्रवाल ने गर्भावस्था में मधुमेह के निदान और समय पर जांच की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
इसके अतिरिक्त एक केस-आधारित चर्चा सत्र भी आयोजित किया गया, जिसमें गर्भावस्था के दौरान जटिल मधुमेह के मामलों के प्रबंधन पर विचार-विमर्श हुआ। इस सत्र में SGPGI से डॉ. अमृत गुप्ता, RML लखनऊ से डॉ. ऋचा यादव, प्रो. मधुकर मित्तल और डॉ. मृत्युंजय कुमार ने सक्रिय भागीदारी की।
कार्यक्रम में विभिन्न विभागों के फैकल्टी सदस्य, रेजिडेंट डॉक्टर और रायबरेली के स्त्री रोग विशेषज्ञों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। समापन सार्थक चर्चाओं और ज्ञान के आदान-प्रदान के साथ हुआ। इस आयोजन ने गर्भावस्था में हाइपरग्लाइसेमिया के प्रभावी प्रबंधन के लिए बहु-विषयक सहयोग की आवश्यकता को रेखांकित किया, जिससे मातृ एवं नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सके।





