ऐसे समय में जब भारत में डिजिटल उपभोग अभूतपूर्व गति से बढ़ रहा है, दूरसंचार विभाग (DoT) द्वारा 6 GHz स्पेक्ट्रम बैंड (5925–6425 MHz) के निचले हिस्से को डी-लाइसेंस करना स्पेक्ट्रम नीति में एक संरचनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। लगभग 500 MHz मिड-बैंड स्पेक्ट्रम को लाइसेंस-फ्री उपयोग के लिए खोलकर, सरकार ने मौजूदा WiFi बैंड में भीड़भाड़ कम करने और अगली पीढ़ी की वायरलेस तकनीकों के लिए आधार तैयार करने का प्रयास किया है। यह केवल एक सामान्य नियामक बदलाव नहीं, बल्कि स्पेक्ट्रम को एक साझा आर्थिक संसाधन के रूप में देखने की बदलती सोच को दर्शाता है, न कि केवल राजस्व-सृजन के साधन के रूप में।
विशेष रूप से, यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब भारत एक डेटा महाशक्ति के रूप में उभर रहा है-जहाँ Cisco के अनुसार 95–100 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं- जिससे मौजूदा स्पेक्ट्रम संसाधनों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है।
तर्क: डेटा-प्रधान अर्थव्यवस्था में क्षमता विस्तार की आवश्यकता
भारत आज दुनिया के सबसे बड़े मोबाइल डेटा उपभोक्ताओं में से एक है। TRAI के अनुसार, प्रति उपयोगकर्ता मासिक डेटा खपत 25–30 GB से अधिक हो चुकी है, जबकि Nokia Mobile Broadband Index (2025) इसे लगभग 31 GB प्रति उपयोगकर्ता प्रति माह बताता है। कुल स्तर पर, भारत का वार्षिक वायरलेस डेटा ट्रैफिक 2,28,000 पेटाबाइट से अधिक पहुँच चुका है, जो लगातार दो अंकों की वृद्धि दर को दर्शाता है।
यह वृद्धि कई संरचनात्मक कारणों से प्रेरित है-सस्ते डेटा टैरिफ, स्मार्टफोन का व्यापक प्रसार, और OTT प्लेटफॉर्म, डिजिटल भुगतान तथा AI-आधारित सेवाओं का विस्तार। उल्लेखनीय है कि कुल डेटा खपत का लगभग 70-80% हिस्सा इनडोर वातावरण में होता है, जहाँ WiFi नेटवर्क प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
हालाँकि, इस बढ़ती मांग ने एक गंभीर बाधा को उजागर किया है-अनलाइसेंस्ड बैंड में सीमित स्पेक्ट्रम उपलब्धता। 2.4 GHz बैंड में केवल 3 नॉन-ओवरलैपिंग चैनल उपलब्ध होने के कारण अत्यधिक इंटरफेरेंस होता है, जबकि 5 GHz बैंड में सीमित और ब्रेक स्पेक्ट्रम उपलब्ध है।
इस संदर्भ में, 6 GHz बैंड का खुलना तकनीकी रूप से परिवर्तनकारी है। यह निम्नानुसार सुविधाएं प्रदान करता है:
– वैश्विक स्तर पर 1200 MHz तक संभावित स्पेक्ट्रम (भारत में ~500 MHz खोला गया)
– बड़े कंटिग्युअस चैनल (80 MHz, 160 MHz, और WiFi 7 में 320 MHz तक)
– कम लेटेंसी (अनुकूल परिस्थितियों में 5 ms से कम)
– अपेक्षाकृत कम इंटरफेरेंस
WiFi 6E और WiFi 7 जैसी तकनीकें इन क्षमताओं का उपयोग करके मल्टी-गीगाबिट स्पीड और अल्ट्रा-लो लेटेंसी प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए, WiFi 7 की मल्टी-लिंक ऑपरेशन तकनीक विभिन्न बैंड पर एक साथ डेटा ट्रांसमिशन की अनुमति देती है, जिससे विश्वसनीयता और गति दोनों में सुधार होता है।
सूक्ष्म स्तर पर, इसका प्रभाव स्पष्ट है:
– सहज 4K/8K वीडियो स्ट्रीमिंग और AR/VR अनुभव
– बिना रुकावट क्लाउड गेमिंग और वर्क-फ्रॉम-होम सिस्टम
– स्मार्ट होम और कैंपस में उच्च-घनत्व डिवाइस कनेक्टिविटी
– इंडस्ट्री 4.0 में IoT और ऑटोमेशन के लिए विश्वसनीय नेटवर्क
आर्थिक दृष्टि से भी, अनलाइसेंस्ड स्पेक्ट्रम नवाचार को बढ़ावा देता है। यह स्पेक्ट्रम नीलामी की लागत से मुक्त होने के कारण स्टार्टअप, MSME और शैक्षणिक संस्थानों को कम लागत में नेटवर्क स्थापित करने की सुविधा देता है। यह विशेष रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण है, जहाँ ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में फाइबर कनेक्टिविटी अभी भी सीमित है।
प्रतिवाद: स्पेक्ट्रम की कमी और रणनीतिक संतुलन की चुनौती
इसके बावजूद, यह निर्णय दीर्घकालिक स्पेक्ट्रम प्रबंधन के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण चिंताएँ उत्पन्न करता है। टेलीकॉम कंपनियों का तर्क है कि 6 GHz जैसे मिड-बैंड स्पेक्ट्रम 5G और भविष्य के 6G नेटवर्क के विस्तार के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, विशेषकर भारत जैसे देश में जहाँ 1.1 अरब से अधिक टेलीकॉम सब्सक्राइबर (TRAI डेटा) हैं।
WiFi नेटवर्क जहाँ सीमित क्षेत्र में काम करते हैं, वहीं मोबाइल नेटवर्क को व्यापक कवरेज और उच्च गुणवत्ता सेवा के लिए बड़े कंटिग्युअस स्पेक्ट्रम की आवश्यकता होती है। ऐसे में यदि 6 GHz का बड़ा हिस्सा अनलाइसेंस्ड कर दिया जाता है, तो भविष्य में मोबाइल सेवाओं की क्षमता सीमित हो सकती है।
तकनीकी दृष्टि से भी चुनौतियाँ मौजूद हैं। 6 GHz बैंड का उपयोग पहले से कुछ सर्विसेस यूज कर रही हैं:
– फिक्स्ड माइक्रोवेव लिंक
– सैटेलाइट संचार
यद्यपि सरकार ने इसे लो-पावर इनडोर उपयोग तक सीमित किया है, फिर भी भारत जैसे विविध परिदृश्य वाले देश में इंटरफेरेंस को नियंत्रित करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य होगा।
एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा डिवाइस इकोसिस्टम से जुड़ा है। यद्यपि Cisco के अनुसार भारत में 90 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, लेकिन WiFi 6E/7 सपोर्ट करने वाले उपकरणों की उपलब्धता अभी सीमित है। इन उपकरणों की ऊँची कीमत भी व्यापक उपयोग को धीमा कर सकती है। यदि घरेलू निर्माण और लागत में कमी पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इस नीति के लाभ तत्काल रूप से सीमित रह सकते हैं।
अतैव हम कह सकते हैं कि 6 GHz बैंड का डी-लाइसेंसिंग भारत की स्पेक्ट्रम नीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन को दर्शाता है-जहाँ अब फोकस केवल राजस्व पर नहीं, बल्कि दक्षता, नवाचार और सार्वजनिक उपयोगिता पर है। लगभग 500 MHz स्पेक्ट्रम को अनलाइसेंस्ड उपयोग के लिए खोलते हुए और शेष हिस्से को भविष्य की मोबाइल सेवाओं के लिए सुरक्षित रखते हुए, सरकार ने एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है।
हालाँकि, इस नीति की सफलता तीन प्रमुख कारकों पर निर्भर करेगी:
– प्रभावी इंटरफेरेंस प्रबंधन और नियामक निगरानी
– सस्ती और सुलभ डिवाइस इकोसिस्टम का विकास
– WiFi और मोबाइल नेटवर्क के बीच नीतिगत संतुलन बनाए रखना
यदि इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान किया जाता है, तो यह पहल भारत की डिजिटल अवसंरचना को नई ऊँचाइयों तक ले जा सकती है-तेज़, विश्वसनीय और समावेशी कनेक्टिविटी सुनिश्चित करते हुए। एक डेटा-प्रधान अर्थव्यवस्था में, इस प्रकार की दूरदर्शी स्पेक्ट्रम नीतियाँ भारत की डिजिटल प्रगति को दीर्घकालिक रूप से सुदृढ़ करेंगी।

निखिलेश मिश्रा
पूर्व सूचना प्रौद्योगिकी अधिकारी





