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लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा ‘लश्कर-ए-भाड़ मीडिया’

लोकतंत्र की मजबूती चार प्रमुख स्तम्भों: विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों पर टिकी मानी जाती है। इनमें मीडिया को चौथा स्तम्भ इसलिए कहा गया क्योंकि उसका दायित्व सत्ता से सवाल पूछना, जनता की आवाज़ उठाना और सच को सामने लाना है। लेकिन जब मुख्यधारा की मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अपनी स्वतंत्र भूमिका छोड़कर किसी सत्ता, दल, विचारधारा या आर्थिक हित का प्रचारक बन जाता है, तब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं।
आज ‘लश्कर-ए-भाड़ मीडिया’ यह शब्द उन मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों या पत्रकारों की आलोचना के लिए इस्तेमाल किया है, जो निष्पक्ष पत्रकारिता के बजाय किसी राजनीतिक या आर्थिक हित के अनुरूप काम करते हैं।
पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उसके निर्णयों की निष्पक्ष जाँच करना है। यदि मीडिया केवल सरकार की उपलब्धियों का गुणगान करे और जनता से जुड़े सवालों, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई या कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को हाशिये पर डाल दे, तो उसकी लोकतांत्रिक भूमिका कमजोर पड़ जाती है। दूसरी ओर, यदि मीडिया केवल विरोध के लिए विरोध करे और तथ्यों की अनदेखी करे, तब भी वह अपनी जिम्मेदारी से भटक जाता है। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह हैं।
वर्तमान समय में सोशल मीडिया और टीवी पर 24 घंटे चलने वाले समाचार चैनलों की प्रतिस्पर्धा ने भी निष्पक्ष पत्रकारिता की दिशा को प्रभावित किया है। टीआरपी, क्लिक और वायरल होने की होड़ में कई बार तथ्य पीछे छूट जाते हैं और उत्तेजना, बहस तथा आरोप-प्रत्यारोप प्रमुखता पा लेते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जनता के सामने वास्तविक मुद्दों के बजाय भावनात्मक और विभाजनकारी विषय अधिक परोसे जाते हैं।
वहीं, जब मुख्यधारा की मीडिया का बड़ा हिस्सा किसी एक पक्ष का समर्थक या विरोधी दिखाई देने लगे, तो आम नागरिक के मन में समाचारों की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में जनता का सही निर्णय तभी सम्भव है, जब उसे तथ्यपरक, संतुलित और स्वतंत्र जानकारी मिले। यदि सूचना ही पक्षपातपूर्ण होगी, तो जनमत भी प्रभावित होगा और लोकतांत्रिक प्रक्रिया कमजोर पड़ेगी।
पत्रकारों को तथ्यपरक रिपोर्टिंग, स्रोतों के सत्यापन और नैतिक मानकों का पालन करना चाहिए। वहीं, मीडिया संस्थानों को सम्पादकीय स्वतंत्रता बनाए रखनी चाहिए और सत्ता तथा विपक्ष, दोनों से समान दूरी रखते हुए जनता के हित को सर्वाेपरि मानना चाहिए।
लोकतंत्र में मजबूत मीडिया वही है जो किसी दल या सरकार का नहीं, बल्कि संविधान और जनता का प्रहरी बने। वह सत्ता से सवाल भी पूछे, अच्छे कार्यों की सराहना भी करे और गलतियों की निष्पक्ष आलोचना भी। यही संतुलन लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
अंततः, किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा किसी एक विचारधारा का मीडिया नहीं, बल्कि ऐसी पत्रकारिता है जो सत्य, निष्पक्षता और जनहित से समझौता कर ले। मीडिया की विश्वसनीयता ही उसकी सबसे बड़ी पूंजी है। यदि यह पूंजी खो जाती है, तो नुकसान केवल मीडिया का नहीं, पूरे लोकतंत्र का होता है।
-श्याम सिंह पंवार

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