पवन कुमार गुप्ता: रायबरेली/अमेठी। अयोध्या में राम मंदिर में चढ़ावे से जुड़े मामले के सामने आने के बाद कांग्रेस के एक प्रतिनिधिमंडल के अयोध्या जाने की तैयारी के बीच लोकसभा क्षेत्र अमेठी के सांसद के. एल. शर्मा को प्रशासन द्वारा अयोध्या जाने से रोक दिया गया। उन्हें उनके आवास पर ही हाउस अरेस्ट किया गया। जिसके बाद कांग्रेस सांसद किशोरी लाल शर्मा ने भाजपा सरकार पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि तानाशाही की पराकाष्ठा देखिए, आज अयोध्या में हमें प्रभु श्रीराम के दर्शन करने तक से रोक दिया गया। प्रभु श्रीराम सबके हैं। उनके द्वार पर किसी श्रद्धालु की आस्था को राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
प्रशासन द्वारा कांग्रेस के प्रतिनिधि मंडल को अयोध्या दर्शन करने से रोके जाने पर अमेठी के सांसद के. एल. शर्मा ने मीडिया में यह भी कहा कि हम अयोध्या किसी जांच को प्रभावित करने या किसी प्रशासनिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने नहीं गए थे। हमारा उद्देश्य केवल प्रभु श्रीराम के दर्शन करना था। दर्शन करना हर श्रद्धालु का अधिकार है। हमारे सनातन धर्म की परंपरा भी यही सिखाती है कि प्रभु के द्वार सभी के लिए खुले होते हैं। यदि लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन प्रभु श्रीराम के दर्शन कर सकते हैं, तो फिर एक जनप्रतिनिधि और उसके साथ आए प्रतिनिधिमंडल को किस आधार पर रोका गया? क्या किसी व्यक्ति की राजनीतिक विचारधारा उसके धार्मिक अधिकारों से बड़ी हो गई है?सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जो लोग भ्रष्टाचार और चंदे की कथित चोरी जैसे मुद्दों पर कठोर कार्रवाई नहीं कर पाए, वही आज एक हिंदू को प्रभु श्रीराम के दर्शन करने से रोक रहे हैं। यह कैसा न्याय है? यह कैसी परंपरा है? सनातन संस्कृति तो किसी भी भक्त को उसके आराध्य के दर्शन से वंचित करने की अनुमति नहीं देती। यदि किसी राजनीतिक दल के लोगों के लिए अयोध्या में प्रवेश या दर्शन पर कोई प्रतिबंध है, तो सरकार को स्पष्ट रूप से इसकी घोषणा करनी चाहिए। लेकिन बिना किसी उचित कारण के किसी श्रद्धालु को प्रभु श्रीराम के दर्शन से रोकना न तो लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप है और न ही भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा के अनुरूप है।









